ठेहेरा नहीं कुछ और
फिसलते लम्हों के साथ
बढ़ते ही गए फासले
जाते समय के साथ
धुंधली होती गयी परछाई
दीखता भी नहीं कुछ साफ़
मन में कही इक आवाज
लगती है आती वही कही से
सुनाई जो देती है अब भी साफ़
की वक़्त के दायरों से आजाद
भी होती है कुछ ऐसी बात
रह जाती है जो बस साथ
देती रहेती है जो उम्मीद
जीने की और मिलने की आश

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