Monday, March 6, 2017

आखिर कैसे मरा सिपाही?


आखिर कैसे मरा सिपाही?




गस्त लगाने, निकल पड़ा था 

तड़के 

वो तनहा ही

सुन्दर वादी, सुन्दर घाटी

अद्भुत छटा दिखती थी

सांय हवा के बीच आती

मौत, किसे चखनी थी 




पता लगाओकौन सी उंगली 

थी वोजिसने ट्रिगर दबायी 

या फिर पता करे की 

किसने बुलेट वो थी बनायीं?




पता करे, था कौन सा कन्धा 

क्या मजहब था जो जीता

जिस जमीं पर गिर पड़ा वो

उस सीमा पर नाम था किसका 




पता लगा लो, थे कैसे सपने 

जो क़त्ल करे और कातिल के 

उसमे रहने वाले थे कौन से अपने

अनवरत लहू बहे जिस दिल से 

Thursday, March 2, 2017


 
सहेज रखे थे
आंसू
तेरे हिस्से के
लो बहा दिए
अब
हिसाब बराबर

Tuesday, February 21, 2017

उज्जवल प्रभात


घनघोर घटायें कितनी हो
कुछ बादल के जाने से
होता मलिन
उज्जवल प्रभात
 
नयनो में तुष्टि
ह्रदय में आग
ले, पथ प्रशस्त
और तेज़ भाग
 
हो शिव तुम्ही
ब्रह्मा भी बनो
भष्म ले लपेट
सागर मंथन भी हो
 
है संदेह कोई
तो क्षण भर में फेक
पीछे अब मुड़
बढ़, आगे देख

Tuesday, February 14, 2017


आज़ाद हो

परिंदे

की वो आस्मां

तेरा है

पर खोल के

तू उड़ जा

सारा जहाँ

तेरा है

बंद कर के आंखे

छू सरसराहट

हवा की

किसी से, कुछ से

क्यों डरना

जब उड़ान भी तेरी है

और

गिर पड़ना

भी तेरा है

मुहब्बत वो दास्ताँ

जो कही ख़तम हो जाये

कॉफ़ी के प्यालो से

सीधी, रगों में घुल जाये

 

मीठे और सुलगते लब्ज़

यु ही बिन बात पिघलते हैं

वक़्त की दहलीज़

पे दिल के काफिले सोते हैं

 

कहे अनकहे , किस्से

बेवाक बयां करते हैं

तन्हाई में महकती वजह

को ही इश्क़ कहते हैं

Monday, February 13, 2017


कुछ मौसम में है

हवा में भी है कुछ

सरगोशी सी

है जूनून का शोर

छिपी है चाहत

की ख़ामोशी भी

Tuesday, February 7, 2017


ज़रा और मुस्कराया करो
ज़ोर लगा के ही सही
की सिकन माथे की नहीं
गालों के गड्ढे फबते हैं
 
गहरी सासो में महसूस
कर लो हँसी, ये जिंदगी
की धागे कच्चे हो तभी
रंग पक्के चढ़ते हैं
 
धीमे धीमे सही, यु ही
थामे चलते चलो
की पाँव तनहा नहीं
तो फिर कहाँ थकते हैं

Monday, February 6, 2017


मुट्ठी में कस के

आरजुएं

भागते रहना

की उन्हें संजो के

रखेंगे

इंद्रधनुष के नीचे

अनदेखा कर धूप

और बारिश

आंखे मीचकर

दम घोटना

सपनो का मुट्ठी में

हाफना

बस भागना सीधे

जीना

तो नहीं

Tuesday, January 31, 2017


टूटती शाख़ शाख़

शाख़ से लगी कली

सूखती मरती जड़ें

गर्त में कहीं पड़ी

चुप चाप बिन आहट

उजड़ती सी जिंदगी

देख कर , मुह मोड़ते

बियावान के कांटे

की ये पौध, इस जमी में

मेरे नस्ल की तो नहीं

क्यों सींचे इसे

मेरे आस्मां का पानी

क्यों मेरे सूरज की किरण

से हो, परायी पात धानी

रे मूढ़, देख रंग

बादल सूरज हवा रुख नहीं बदलते

आज ये, तो कल तू भी

आग की लपट , पता नहीं पूछते

Monday, January 30, 2017


मुकम्मल हर इश्क़ जो होता
तो कैसे ये जबान
नमक आंसुओ का चखते
राते हिज़्र की आती
अस्मा के
तारे ही गिनते
जानते जहर भी
पिया जाता है ऐसे
अपने सीने पे हाथ रख
उनकी धड़कने सुनते

Friday, January 27, 2017


पिया

आवारा गलियो की धूल निकला

इश्क समझा

वो , जवानी की भूल निकला

 

तीर प्यार का समझ जो कसक

पाल रहे थे

वो फांस गले की

जिगर का शूल निकला

किसी की रूह में आज
होके गिरफ्तार
बून्द बून्द फिर शुकुन को
तरसने का जी करे
 
उम्र भर तुझे पा पा के खोया
अब जो खोया
तो बस एक बार
पाने का जी करे

Saturday, January 7, 2017


बैंड बाजे 

सेहरा घोड़ी 

फिर भी वक़्त पे आकर 

हाथ थाम लेना 

प्यार

नहीं तो और क्या है 

फूल तोहफे 

वादे सिफारिशें 

फिर भी 

पर्वतो से अडिग , निभाना 

प्यार , और क्या है

रोना तड़पना 

ही झूमना हो चंचल 

कुछ दिल की कहना

बस, करते

चलते जाना 

राह एक, राह सीधी 

तेरे दिल से

मेरे दिल की 

प्यार

ही तो है