Thursday, October 5, 2017

जितनी जल्दी मैं
मन में बेस तुम्हारे प्रेम
की जड़ों को
तुम्हारी स्मृतियों से सींचना
बंद कर दूँ
उतना अच्छा
पर ये कम्बख्त
बेमौसम की बारिश का क्या
जो इसे नाहक
बरसो से
हरा रखे है
अब तो
ऐसी फ़ैल गयी है
की
जो ये पेड़ कटे
तो मेरी जान जाय

Tuesday, October 3, 2017

कोलकाता - मेरी जन्मभूमि. कभी भी मेरे पास पर्याप्त शब्द नहीं होंगे यह व्यक्त करने को, की क्या क्या मिला है मुझे बस वहां जन्म लेकर. कितने गौरव और कितने आह्लाद से आज भी वहां की हवा के स्मरण मात्र से जैसे जीने की अभिलाषा पुनः जीवित हो जाती है. हाँ, उसी धूल कोलाहल और पसीने में सनी हवा. भाषा यु तो मैंने वहां की सीखी ज़रूर पर निभाई हिंदी के साथ, पर जहाँ बात भावनाओ की आती है और अपने घर की वो तो बस एक ही है. साक्षात् भगवती का घर, दखिनेश्वेर का ईंट वाला लाल आंगन और मटमैली गंगा की निरंतर बहती तटस्थता. अपना तो बस वही घर है... जो है. इस हाड मांस के शरीर में जो आत्मा अविचल धधकती है वो शायद वही रचने बसने को तरसती है. जो भी अध्याय आजतक लिखे, उस लेखनी में स्याही इन्ही अनुभवों का है जो मुझे वहां की हवा मिटटी ने दिए. वही ढोये बाँटते और सुनते चलती हूँ.... मांझी रे

Wednesday, September 27, 2017

Beauty 
That is life
As I watch
With passage of time 
Filling my heart 
Taking it in
The bliss spills
Through my eyes

Scars

Scars
Scars that you see
Scars the you don’t
Scars you can find
And those that you wont
Scars, silently bleed
Scars, those scream
Scars left for all
long-forgotten dreams
Scars, that you stare at
Scars, that you admire
Many, are a reminder of
those unfulfilled desires
Scars you may think
Are a piece of an art
Leaving an enviable pattern
mosaic, of the broken heart
Dead, Long ago
No, it doesn’t hurt anymore
If you have any darts?
Practice, Practice, some more
स्नेह क्यों यु ही 
बिखेरू
रेत के टीलों पे
जो बरसे अगर 
तो सींच सकती है 
कितने ही उपवन
युग युगो तक
रह रह के नैनो में अब भी
दरिया कोई आता है उमड़
बादल ऐसे मायूसी के
क्यों ठहरे है घुमड़ घुमड़
तन्हाई खामोशी ऐसे
तितर बितर हो जाती है
हंसी तेरी बिजली जैसे
जब मन में कौंध के आती है
खाली खाली सूना सूना
इस आँगन का कोना कोना
तेरे वापस आने की
आहट पाने को चौकन्ना
आय मिस यू कहकर
रोने की शकल भेजते
और दूसरे विंडो में जोक पढ़ते
lol लिखते
हाय कितने झूठे
ढोंगी हो गए हम
लाइफ fairytale है
का वॉलपेपर लगाकर
दीवारों के सूने
सन्नाटे नापते
बड़े ही मक्कार और
फरेबी हो गए हम
मन के अंदर के भवर को
गांठ दर गाँठ में लपेटे
स्माइली और सेल्फी बाँटते
कितने खोखले
कितने बेवजह हो गए हम
दुर्गा पूजा और मेरा घर, कोलकाता. मेरे बचपन का घर, अल्हड़पन के दिन सब जैसे बिलकुल घनिष्ट हो इन दुर्गा पूजा के ही दिनों के. पंडालों का तिनका तिनका जुड़कर बढ़ना और स्कूल से आते जाने नापना कौन सा कितना रेडी हुआ. इंतज़ार एक एक दिन का और भगवती के आगमन से जैसे एक नयी जान ही फूंक जाया करती थी, हर उस चीज़ में जिसे मनुष्य प्रायः प्राणहीन समझता है.... सड़के गली मोहल्ले दीवार ... जिधर देखो सब जीवंत. सब की धड़कने गूंजती ढोल में , शंख में , घंटियों में ,उलू में या यदा कदा बाज़ारो के शोर में, सर्वत्र एक ही संगीत जैसे प्रकृति भी कह रही हो 'माँ एशेछेन ' ( माँ आ गयी हैं). माँ का आना अपने घर, अपने मायके आखिर क्यों कर कोई कसर बाकी रखे कोलकातावासी ....बेटियों के स्वागत में. जगतजननी भगवती के साथ, हर घर की हर भगवती को और उनके आगमन को पलके बिछाये हर व्यक्ति विशेष को मेरी ओर से 'शुभो विजया'.
हलाहल तो कंठ में
हम भी रखते हैं शिव 
उसे ह्रदय तक पहुँचने
पर देते नहीं 

कड़वी जिह्वा सही
पर स्नेह और प्रेम 
जहाँ बसते है वहां 
सत्य मरते नहीं 

दिल खोल कर इकबार 
लुटाई और समेटी है ख़ुशी 
बाँध के अब ये पोटली 
छिपाकर रखना है सबसे 

न कोई चुरा ले न कोई छीन ले मुझसे 
तन्हाई में बस चुपचाप 
निहारती हूँ उन लम्हो को 
जिसकी बाट जोहि, ह्रदय ने जाने कबसे


ज़रा और मुस्कराएं
हँसे और खिलखिलाएं 
जिंदगी खूबसूरत है 
स्वयं जाने और बताएं
किसी ने कहा की 
रिश्ते तो अब बस 
ट्रांसक्शन बन गए 
पर सच पूछो तो 
वो भी कहाँ बचा है
बिज़नेस में तो 
मोल भाव दर दाम
करते हैं
कुछ बेचते है तो
मोल दे कुछ 
खरीदते भी हैं 
बाजार की भीड़ 
इच्छा अनिच्छा 
खाते हैं धक्के
घूम फिर लेकिन
वहीँ हर बार 
आते है. 
मैं तो कहती हु
आपने रिश्तो को
समझा है बुरा सपना 
नींद में आये पर
जगते ही भुलाते हो 
उन्हें रखते हो सच से दूर 
जतन से पालते हो डर
पहचानते नहीं 
तो आखिर ये बचे क्यूकर
বৃষ্টি হলে 
আসবে বলে 
এলে না কেনো ?
বলো তো 
কয়েক   যুগের পর 
নেমে ছিল 

তাকিয়ে আকাশ 
আজ কে যে প্রথম 
পড়লো জল 

আমি গুছিয়ে ঘর 
ছিলাম দাড়িয়ে 
অশেষ বৃষ্টি 
চোখে নিয়ে 

আর তুমি তো
এলে না?
ख़तम हो गए सारे बहाने
सुन मेरे पागल दीवाने 

और तुझे फुसलाऊं कितना 
बातो से उलझाऊँ कितना 

मेरे किस्से बोर हो गए 
तेरे वादे शोर हो गए 

इश्क़ विष्क की ख़तम मुरादें
पर तेरे अब भी वही इरादे 
छोटी मोटी कौन करे अब
चल बड़ी कोई दीवार गिरा दे 
शब्द भी साया सा
मन के अंधेरो में
जैसे
साथ छोड़ 
रहा है
सन्नाटे काटते भी है
पर इस सिलती जिंदगी 
के अब वही
साथी भी हैं 
हमें भी फज़ूल आदत रही
अल्फ़ाज़ चंद लिख कर 
पन्ने फाड़ फेकने की 

इस कदर आज महफ़िल में
तनहा खामोश न बैठते 

जो कभी ख़ास एक नज़्म 
हमने भी पूरी काश 
लिख  डाली होती
आ चलो
बरसे मेघा बन
आंगन आंगन 

थिरके नाचे 
चमके जुगनू बन
चंचल घन वन 

बस रुके नहीं 
कोई बांध ले 
करके बात लुभावन 

फिर सड़ती नाली 
और मृत कीट  
रह जाये जीवन 

आज़ाद करो
आज़ाद रहो 
है प्रेम जो प्रीतम
प्रेम
कैसे करते हैं
आकुल हो
व्याकुल हो
कभी ह्रदय 
तो कभी मन
के भ्रमो में फंस 
अनाप सनाप 
रो कर मनाकर 
कभी कह कर 
फुसलाकर 
तो कभी नैनो में 
बांध रोक
पथ्थर सीने पर 
होठो पर कसकर मौन 
भी तो
कर लेते है प्रेम 
और भला कौन सी 
पद्धति बाकी है
और कैसे करते हैं प्रेम?
हमें कहाँ जचती है
भारी परिपक्वता और 
सब सही सही 
हमें तो हंसी ठिठोली 
दीवानो की
उलटी पुलटि महफ़िल ही भली

Wednesday, May 17, 2017


बच बच के इस गली से

अब हम गुजरते हैं

हवाएं रुख बदलती हैं

दिल हम थाम लेते हैं

 

इधर पलटी की उधर

बस ये देखते हैं हम

ख़ामोशी और शिकवों से

सुबह और शाम लिखते हैं

Thursday, May 11, 2017


स्कूल की बस जो गयी

कांच के शीशे चमकाती

एक पल में चुंधियाती

मुझे भी संग ले गयी

 

गली में यादो की

बस में हंसीं ठिठोली

शोर में चुहल की

मैं तो आज बह गयी

 

इंद्रधनुष के पीछे

भागते साथी संगी

बरसाती में अनमने

लगाते छलाँगे

 

एक झटके में जगे

 खुद को आज में पाया

सोचा, क्या वो पल एकबार

क्या फिर लौट आएंगे?

 

Friday, April 7, 2017


क्योंकि

या तो तुम थी , या मैं

 

जब खो गया था

ड्रेस से मैच पिन

या एडमिट कार्ड

परीक्षा वाले दिन

 

बैग की ज़िप

फिर से हुयी थी ख़राब

या मुझपर हावी था

वक़्त का दवाब

 

या तो तुम थी, या मैं

 

तुमने देखा था

और समझा था

रंगों का था

पागलपन मुझमे

 

हाथ पकड़ ले गयी

मैंने सीखा

और पाया

नया अपनापन जिसमे

 

माँ तेरे बनने से

मैंने ममता जानी

मेरे ह्रदय के शूल

 तेरे आंख का पानी

 

 या तो तुम थी या मैं

 

फिर ऐसा अरसा

कुछ निकला

तुमने जाना

मैंने सोचा

 

कैसे रेत से थे लम्हे

निकल भागे मुठी से

भाग खुद से रही थी

दूर हो गयी तुझी से

 

धूल आईने से साफ़ करते

एक दिन फिर तुमको देखा

मेरे नैनों में खिंची थी

तेरे अख़्शो की रेखा

 

फिर से एकबार

हमने मिल के जग जीता

थाम हाथ संग थिरके

पल भर में युग बीता

 

या तो तुम थी, या मैं

 

उस रात की एक बात

इस रात तक बची है

अब तो पथरो पे अपने

नाम की लकीर खींची है

 

वक़्त बीते बदले मौसम

पर कुछ तो है जो वही है

जो गलत था, गलत था

अब सही, तो सही है

Thursday, April 6, 2017


हम सुनाते हैं मुहब्बत

उनको जाती है जम्हाइयां

और कमबख्त दिल

उनके सोते ही, बंद पलकों

पे कशीदे लिखने बैठ जाता है

गहरी सी कोई बात

चुभती सी कोई याद

बरसते से कुछ लम्हे

तरसते से कुछ जज़्बात

यही तो बस, इकाई

मेरे रूह के जमी होने की

भूलती सी मैं अब, दुहाई

तेरा मुझे यु, छोड़ दे जाने की

एक ही तो है

इश्क़ मेरा हो के तेरा

क्या पाना क्या निभाना

बस, बंद आंख में बसेरा

दिल को निचोड़ती हूँ

तो टप टप गिरती है

अभी भी

फिर से उसे सीधा कर

टांग आती हूँ

बरामदे पे, की सूख ही जाए

पर ये जिद्दी बादल

बस

बरसना ही जानते हैं