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Showing posts from January, 2021
  As I floated off the earth Reaching for the moon The moon smiled and said Oh my child, not so soon You may see me sometimes, and sometimes you won't You will know that you have me You may doubt, that you don't Just know, just watch, and Acknowledging eternal love Find that peace within As I watch, from far above As I watch, from far above
 मेरी बात करो न  क्युकी मैं भी तुम्हारी कर रही हूँ  इसकी उसकी  यहाँ की वहां की  सारे जहाँ की  मुझे क्यों सुना रहे हो  मुझसे शिकायत है तो कहो  क्युकी मुझे तो तुम्ही से है  नहीं सुनोगे?  मत सुनो.  पर मैं कहती रहूंगी  पर मैं लिखती रहूंगी  होते रहेंगे वार्तालाप  मेरे और तुम्हारे न सुनने के बीच  बनते रहेंगे तिनकों के पहाड़ अनकहे अनसुने शब्दों के  और एक दिन क्या होगा पता है?  मैं इन तिनकों के पहाड़ को  हवन कर के , बढ़ जाउंगी  फिर तुम सुनते रहना  राख में बुझती चिंगारिया  फिर तुम चुनते रहना  मेरे अरमानो की जली हड्डियां  जानते नहीं क्या? मैं हाड मांस की कहाँ  ख्वाबो, अरमानो और ज़ज़्बातो से ही तो बनी थी 

पर क्या वो खुश है?

 अरे सुना तुमने? लाड़ली का ब्याह है  क्या सुन्दर दूल्हा, क्या शानदार घरबार है  भाग्यवंती है लाड़ो  पर क्या वो खुश है?  कितने गहने, कितने कपडे लत्ते  क्या ही ठाट बाट है  सबकुछ शुभ शुभ निपट गया  ये सब किस्मत की बात है  वो सब तो ठीक, लेकिन क्या वो खुश है?  खबर आयी है, लाड़ली पेट से है  भगवन सब को ऐसी किस्मत दे  अरे बेटा हुआ है मिठाई बांटो थाली बजवाओ  हाँ हाँ खिलाओ, लेकिन वो खुश तो है न?  अरे क्यों न होगी? करमजली  तू , हर बात पे ये सवाल क्यों कर बैठती है?  कौन नहीं होगा खुश?  अब आँखों का खालीपन है तो क्या  हम उसे शुकुन कह लेंगे  सीने में जरा डर रहता है तो क्या  हम उसे जूनून कह लेंगे  बोलना चला जरा कम कर दिया है  उसे उम्र या लिहाज कह लेंगे  अब ठहाके नहीं लगाती , तो क्या  अब शिकायते भी तो नहीं करती  हमने समझा दिया है उसको.  और तू भी चुप कर, बस लड्डू खा  हाँ , क्यों नहीं  बस ऐसे ही पूछ लिया। मेरा भी नाम लाड़ली था  न  इसीलिए. 
 मैंने कहा तो था तुमसे  कभी आँखों से  कभी बातों से  कभी रो कर  कभी चुप रहकर  कभी लिखकर  कभी गुनगुनाकर  कभी कभी तो छिपाकर  कई बार सुनाकर   कभी तड़प कर  कभी चीख कर  कभी तुम्हारी आदतों  को सीख कर  कभी रंग कर  कभी थिरक कर  कभी सेहमी हुयी  कोने में ठिठक कर  अब ये क्या की  तुम सुन ही न सके  ढेले भर की डिग्रियां  जो तुम पढ़ न सके?  अब शब्द नहीं है  रंग भी उड़ गए  बेरुखी की धूप में  एहसास भी झड़ गए  अब मैं टूटे घुँघरू  समेट लूँ सहेज लूँ  जो था ही नहीं उसे सवारा  अब खुद को सवार लूँ  आईने को देखकर  मुस्कराती हूँ , तो वो भी हँसता है  मैं तो हूँ न तेरे संग  यकीं हर बार, मुझे देता है  रह लुंगी , हंस लुंगी  शुकून इतना तुम रखना  पढ़ने, सुनने लगो जिस तरह  वैसा, कुछ तुम भी कर लेना 

NO

No  I will not allow you to suppress my voice No, I will not allow taking away my choice My choice to be me My choice to remain with me  My choice to jump in puddles or  My choice to cry and scream  Taking away my voice, my feelings Because you don't understand a word You only have darkness, self-pity And this venom lined sword I won't let you slice me up and then toss me in the air I won't then let you catch them all and become the savior  I won't let you keep that mask on, that has slipped too many times  I won’t allow that monster, to cross even an inch of my lines  I will bring on my claws and split you open if you even move  Stop now, stop right now, with your hollow claims of love  Go away and do not return, ever again my way  You know honey, I truly mean it, when I say   

सदा सुहागन रहो

 सदा सुहागन रहो  माँ, मुझे अब नहीं रहना  माँ मुझे अब नहीं करना  माँ  मुझे अब नहीं सहना  माँ, माँ , सुना तुमने ? टुंगटुंगाटी रही मंदिर की घंटी  तुम आज फिर एक बार  लहू अपने हृदय का हथेली पे रंगे  मैं आयी थी तुम्हारे द्वार  कहते रहे तुमसे  नयन से बहते अश्रु धार  इतनी सी विनती की  नहीं, भेजो मुझे उस पार  बहन ?  दीदी ?  दोस्त?  सखी ? खटख़टाकर द्वार सारे  मैं अभी आयी यहाँ थी  खिड़कियों से ही सबने  मुझसे अब लेली विदा सी  बस स्नेह, धैर्य विश्वास  की तुमसे उम्मीदे थी सखा  लेकिन ये क्या किसीने तो  पलट कर भी नहीं देखा?  ओह, तुम्हारी आरती का वक़्त है  मैं भी यहाँ क्यों आ गयी  अपनी विपदा के लिए आखिर  जिम्मेदार तो ठहरी मैं ही?  क्या काटना शिशुपाल का सर  कृष्ण का एक दोष था ?  अपने प्राण की रक्षा करना  अब मेरा प्रतिशोध था?  जानकार अनजान बनना  देना मुझे सच की सजा  क्या तुम्हारे अपने मन का चोर  है इस दुर्व्यवहार की वजह?  नाम उसका और मैं  इस नाम से जोड़ूँ नहीं  झूठ भ्रम और लांछनो के  क़र्ज़ मैं ओढ़ूँ नहीं  इतना कहने के बाद भी  तुम बस पूछती हो "कैसी हो"?  प्रत्युत्तर की आकांक्षा नहीं  आशीष ये की सदा सु