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Showing posts from April, 2014
बडी मुद्दत से यकि प्यार के वजूद होने पर आया जरा जरा सी बात मे नाहक हि ना झुठ्लाओ तुम बडा खुद्गर्ज़ ये मिज़ाम मेरा, अब हो चला है लो ये पलके झुकायी , सामने आ जाओ तुम
सुलगते जज़्बातो को हमे हवा और नही देनी है चलो जाओ भी तुमसे अब कोइ, बात नही करनी है कोरा सा भोला भाला ये खाली पन्ने सा मन था रन्ग अन्गिनत भरदिये , मुझे ्कर दिया भ्रमित सा हर एक नये अल्फ़ाज़ से, अन्दाज से , उलझति मै जाती हू अब एक लकीर नयी मुझे , इसपर नही खिचनी है चलो जाओ भी तुमसे अब कोइ, बात नही करनी है बहुत बार टाला, फ़ुसलाया दफ़ा लाखो पर बेलगाम मन की, हिमाकत तो देखो यु छुप छुप के तकिये भिगोने, ठन्ढि आह नही भरनी है चलो जाओ भी तुमसे अब कोइ, बात नही करनी है

मरीचिका - इन्द्रधनुष

कस कर मुठ्टी, बाँध कर कमर भागे सारे, संग संग हम नही जानते थे नादान सब दौड़ रहे हैं मरीचिका कि तरफ़ हाफते हफ्ते गिरते पड़ते कभी सम्हलते कभी फिसलते रुकते चलते धक्के मारते बेतहाशा, पहुचेतो मिली हताशा आँसू ढलेक , खोली मुठ्टी खोली मुठ्टी, तब भौचक्के सबने देखा इन्द्रधनुष मुठ्टी में बंद था बिखरे रंग, और निखरा जीवन खिलि रोशनी, बरसे सावन