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Showing posts from October, 2011

Cactus & Lotus

Cactus Grows and flourishes on deserted grounds Endures and thrives in extreme conditions Adapts to survive, covers self with prickles Lives by itself and doesn’t easily withers Standing proud and tall in desert land Cactus I am, dare you lay your hands Lotus Blossoms, blossoms colorful it floats Sweet delightful fragrances it boasts Sways with all winds that gushes by Floats on with every wave passing by Moist and muddled. Oh tender so tender, Connections deep attached under water If you are careless as me, don’t mind the mess Feel me close, I am all for caress
थमी थमी सी साँसे, और तेज़ सी धड़कन है तुम आए क्या? अभी नहीं - ये तो बस आह्ट है आज मिलोगे फिर जाने तुमसे कब मिलना होगा बंद नहीं , खुली आँखों से तुमको फिर देखूंगी क्या? भर लूं मैं आज तुमको, अपनी सासों में कुछ ऐसे रहे खुशबु , बीते सदिया और जबतक चलती है साँसे
कोई आता है और कोई हो जाता है दूर पागल ये मन, अपनी आदत से मजबूर होकर के भी पास, किसी से अनजाना न होकर भी हो एहसास ऐसा है अपना हाथो की रेखाओ में, बुना है तेरा नाम कही मैं ही बस पढ़ सकी हूँ, मुट्ठी में बंद खुशिया, खोलू तो जाएगी बिखर डर से, इनको बांधे रखती हूँ दुखता सा है,कही खिचे मन को जो इक डोर बिखरे बिखरे सपने, बस सन्नाटो का शोर झूठी झूठी सब बाते, सब कुछ बस एक छलावा सच एक तुम हो , और प्यार मेरा सारी दुनिया झूठी , सारे रिश्ते ढोंग-दिखावा
पकड़कर चढ़ी थी, उम्मीदों की बूंदों जब बारिशे घनी थी खुशियों की बैठ सपनो के बादलो पे देखा उगते सूरज को पल भर को ही था देखा की इन्द्रधनुष ने उतारा मुझे फिर से जमीं पर गीली थी मिटटी, किचड़ो में सनी मैं बस देखती रही ऊपर , सोचती रही क्या पाया , क्या चाहा और क्या खोया ?
कुछ खुबसूरत सा, सूरज की पहली किरण में चमकता ओस की बूंद सा, धुला धुला सा पहली बरसात में, कोमल कोपल सा कांपता हर झोके से, नाजुक पंखुड़ी सा मासूम इठलाता , करता अनगिनत अदाए कितनी कहानियां, किस किस को सुनाये बदलते मौसम की ये सर्द हवाए डरती हूँ कहीं न मेरा ये फूल मुरझाये
उधार की इस जिंदगी में , आरजुए हज़ार और उम्मीदे कम खावाहिस इतनी की किश्तों में मिले खुशिया और किश्तों में गम

कमल ह्रदय का

महकते कमल सा खुला अधखुला सा बहकता हवा संग पानीयो पे डोलता सा डूबता सूरज संग करती बंद पंखुड़िया फिर उनींदी सी खुलती वो भोर की किरण से लहरों पे भागती-झूमती कभी कोम्हल सी, धूप में ये कमल ह्रदय का मेरा तुम्हारा

खुबसूरत ख्याल

ख्याल एक खुबसूरत सा, कल रात में आया था पर रौशनी गुल थी , और न थी लेखनी हाथ में याद कर कर के उस ख्याल को खुद को सोने से रोका था, पर नींद आनी थी सो आके ही रही फिर भी, किया प्रयास की, वो मेरा ख्याल खो न जाए कहीं, सपनो की गलियों में पर अनगिनत खेल खेलने वाला ये मन न जाने दिखाता रहा मुझे सपने कैसे कैसे सुबह आँख जो खुली मेरी, रौशनी ही रौशनी थी सपनो की कुछ परछाईया भी तैर सी रही थी पर जैसे धुप के खिलते ही, गुम हो जाती है ओस धूमिल हो गई सारी परछाईया और मेरा खुबसूरत ख्याल, उन्ही अंधेरो में खो गया जहाँ जाने को कोई राह ही नहीं....