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Showing posts from January, 2011

खुशहाली पकाओ

चलो सुलझाए कोई आज गुत्थी रिश्तो की गांठे गिरहे तेरे-मेरे मन की रसोई में घर की हाँ लगेगा बहुत सारा वक़्त और धीरज भी लाना होगा थोडा हल्का सा मन और मुस्कराहट से सजाना होगा परोसेंगे आज रात थाली में सुलझा सा मन और कुछ मीठी यादे कहकहो की लस्सी और सुलगती सी बाते कड़वा और तीखा आज की मेनू से हटाओ ऐसे ही अब घर में खुशहाली पकाओ

अनदेखा कर दो

कुछ नया..कुछ नया कहाँ से सुनाऊ गीत मेरे पुराने की मैं वोही पुरानी हूँ नयी नयी बाते ढूंढ़ कर कहाँ से लाऊं आँखों को मेरी भाती है, बाते पुरानी रंग नए लाकर बनाऊं मैं कैसे नए चित्र कोई, जो तुम्हे पसंद आये मेरे पास एक वोही पुरानी कलम है इन्द्रधनुष में युगों से वही सात रंग है पर कोई नहीं कहेता , इनको बदल डालो मुझमे भी कही छवि है उस एक शक्ति को पसंद ए थो आये, या अनदेखा कर दो
कठपुतली सी मैं तुम्हारी उंगलियों के बीच अनगिनत ही नाच दिनरात नचाती है भावनाए मेरी , कब मेरी हुई हैं बस बाते तुम्हारी, रुठती और मनाती है कहने से तुम्हारे ही छाते हैं बादल और ये पागल मन मेरा मयूर बन नाचता है छिप जो जाते हु तुम बदलो में चाँद बनकर चकोर बन ये निष् दिन तुम्ही को ढूंढता है तोड़ कर ये सारे बंधन छूट जाऊं भी तो कैसे की धागों से तेरे, मेरी सांसो का रास्ता है
है किसका इंतज़ार की दर्पण में बार बार सवारती हूँ खुद को पर हर एक बार आहट कोई भी ध्यान लेती है खीच तुम तो आते नहीं बिखर जाती हूँ मैं फिर इस आने जाने के बीच