जब जा रहे थे तुम, और आँखों का मेरे रंग जो छलका
तुमने क्यों कहा की, एक भी आंसू तुम्हारे ना छलकने दो

पलकों को फिर मैंने नहीं गिरने दिया बिलकुल
बात को सुनती रही , देखती रही हरेक हरकत को

थी कितनी बाते बोलने की और पूछने की
कब मिलोगे, कब मैं देखुगी तुम्हे फिर से
कैसे कहूं की प्यार कितना है मुझे तुमसे
कब ये जानोगे की, जीना जानती नहीं मैं
लेती हूँ साँसे बस तेरे ही इंतेजारी में

कुछ नहीं, कुछ भी नहीं, एक शब्द न बोले
वरना ये बाढ, आंसुओ का रोक क्या पाते?

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