मरीचिका - इन्द्रधनुष


कस कर मुठ्टी, बाँध कर कमर
भागे सारे, संग संग हम
नही जानते थे नादान सब
दौड़ रहे हैं मरीचिका कि तरफ़

हाफते हफ्ते गिरते पड़ते
कभी सम्हलते कभी फिसलते
रुकते चलते धक्के मारते
बेतहाशा, पहुचेतो मिली हताशा

आँसू ढलेक , खोली मुठ्टी
खोली मुठ्टी, तब भौचक्के सबने देखा
इन्द्रधनुष मुठ्टी में बंद था
बिखरे रंग, और निखरा जीवन
खिलि रोशनी, बरसे सावन

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