कब से कब तक और कितना इंतज़ार और क्या मिलने से इंतज़ार ख़तम हो जाता है? और क्या इंतज़ार न करने से इंतज़ार ख़तम हो जाता है? तुम हसते रहे, सबके साथ वक़्त यु गुजारा किये की बस, जो है यही है और कही कुछ भी नहीं है वही पर हमने, लिखा, कहा एक एक दिन को कागज पर नापा उसको पहचान दी, नाम दिया तो क्या हुआ? तुम्हे जिरह तक करनी पड़ी बताना पड़ा मुझे मैं बस अभी नहीं हूँ, लेकिन हूँ मैंने सौ दफा तुम्हे याद दिलाया बेकार की बाते तुम्हे बताती रही कभी शिकायती अंदाज में कभी आँखों में आंसू भरकर तो कभो ये कहकर की चलो, अब जान में जान आयी सच तो है की मेरा इंतज़ार तुम्हारे इंतज़ार से ज्यादा और बड़ा नहीं हो गया जैसे हवा थी सांस है कभी तेज़ कभी कम कभी सन्नाटे में गूंजती हुयी कभी शोर में दबती हुई वैसे ही इंतज़ार था और शायद थोड़ा सा रह जायेगा मिलने के बाद की करेगा इंतज़ार, क्युकी वो कम्बख्त कभी ख़तम होता है क्या?...
पकड़कर चढ़ी थी, उम्मीदों की बूंदों जब बारिशे घनी थी खुशियों की बैठ सपनो के बादलो पे देखा उगते सूरज को पल भर को ही था देखा की इन्द्रधनुष ने उतारा मुझे फिर से जमीं पर गीली थी मिटटी, किचड़ो में सनी मैं बस देखती रही ऊपर , सोचती रही क्या पाया , क्या चाहा और क्या खोया ?
आप वक़्त निकालें और आया करे हमसे मिलने तब जब सुबह हुयी भी न हो रात बची भी न हो लेके हौसले बुलंद आंखे, खुली कुछ बंद सांस ठहरी सी, मंद आप आया करे और, रुक जाया करे हम परदो को गिराकर शामें ज़ाया करे उँगलियाँ फंसी से हो लबों पर हंसी सी हो ठहरी , ख़ुशी सी हो कब? तब. जब जब , हम बुलाया करे आप आया करे. आप आया करे.
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