साथ अपने जैसे

हवा भी बांध ले गए

दम घुटता है

न सांस ली जाती है

चित चकोर मन मयूर

मृगतृष्णा मन को

कोई भरमाई जैसे

सुख चैन बावली हरे जाती है

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