समेट लो
की लग रहा है
अब बिखर ही जाउंगी
टूटे धागों में बंधी माला
नहीं और
थाम पाऊँगी
हूँ डरी भी
हूँ मैं तनहा
देखा है अभी अभी
उसे गिरके मिटता
नहीं होता
नहीं होता
क्षण क्षण अब ये
खुद से झूठ ही कहना
की उम्मीद है
कुछ पल और
टिके रहना

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