आसमान का रंग नीले से गुलाबी होता हैऔर फिर गहरा और गहरा.
सूरज धीमे धीमे डूब चुका है रात की गोद में चाँद फ़लक पर ऐसे चमक रहा है जैसे सारा आस्मां अब उसका अपना हैबेचारे तारे अभी तकटिमटिमाने की भी हिम्मत नहीं कर  रहे,बस एक कोई है चाँद के पास जो ढीठ सा रोशन हुए जा रहा है.
हवाएं भी बड़ी अच्छी चलती है शाम की ऐसी बेला में , ख़ास कर गंगा के किनारे
धरा की आँखों में जैसे आसमान का सारा रंग हूबहू उतरा हुआ है.
ऐसे कैसे वो नितांत एकाकी और सम्पूर्ण हो सकती हैएक ही पल मेंऔर ये जो कोई बांसुरी बजाने लगा हैउफ़.

धरा आँखे बंद कर लेती हैलेकिन ऐसी मधुर धुन को मन कैसे भला अनसुना कर सकता हैऐसा लगता है जैसे एक एक सुर सीधाउसके ह्रदय को भेद रहा हो.
 क्या करू ? कहाँ जाऊं ?
 दोनों पाओं को पानी में डाले ऐसे ही बैठे रहूँ?
 लगता है ये गंगा का पानी नहींअब तो मेरी बेड़िया है जैसेपैर ही नहीं उठ रहे.. कही ये पानी मुझे अपने अंदर ही  खिंच ले.
अगर ले भी जाये तो क्याकम से कम इन बांसुरी की धुनों से तो जान छूटेगी।

पर मन ही मन ये भी सोचती हूँकी कही जो ये धुन बंद हो गयी तो यहाँ मेरे और पानीयो के थपेड़ों के अलावा कुछ भी  बचेगा.  लेकिन , ये धुनें जो मेरी धड़कने बढ़ाये जाती है , उसका क्या
 ईस उहा-पोह में उसका ध्यान ही नहीं जाता की ठीक उसके पीछे वाली सीढ़ियों पर व्योम  बैठा है.
 अरेतुम कब आये?
 कब से तो यही हूँ.... तुम ही  जाने कहाँ खोयी रहती होकभी देखो तो जानो.
कहते कहते बरस पड़ती है उसकी जानी पहचानी हंसी.
अब बस भी करो.. अच्छा यहाँ आओ पीछे पलट कर कैसे बात भी करू?
 , मुझे नहीं भिगाने पाँव।  तुम्ही बैठो।
धरा दो पल फिर अपने नितांत एकाकीपन  में खो जाती हैलेकिन तीसरे पल हवा का एक झोका जैसे फिर एक बहकती हुयी धुन उसके बालो में गूंथ जाती हैऔर सारा गंगा का घाट बेलीचमेलीगेंदा , गुलाबरजनीगंधा और रातरानी की खुश्बुओ से एक   साथ महक उठता है
धराव्योम का हाथ खींच कर नीचे ले आती है और वो ऐसे चला आता है जैसे हमेशा से इसी अपेक्षा में थाअब एक शरारत भरी मुस्कान तैर सी रही है उसके चेहरे पर
लेकिन मुझे अपने पैर नहीं भिगाने
तो?
कहते कहते ही व्योम अपना सर धरा की गोद में रख कर लेट जाता हैदोनों की नज़रे टिकी है चाँद पर जो अब अपने पूरे शबाब   पर हैधरा की उंगलिया अपने आप ही व्योम के बालो से खेल रही है, जो की अब चांदनी से नहाया हुआ है. 
कितने बाल बड़े कर रखे हैं तुमने? 
क्यों? तुम्हे क्या परेशानी है? मेरे हैं.. 
कुछ भी...तुम्हारे है तो क्या हुआ? ऐसे कोई बाल बड़े करके घूमता है क्या? 
जलती हो, नहीं?
फिर वही हंसी और अब क्या बोले धरा. निरुत्तर है , हमेशा की तरह. 
उसे तो इतनी सी तसल्ली है बस की ये धुनें  अब उतना परेशान नहीं कर रही. शायद  कुछ शुकुन सा बन गयी है.

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