कौन कम्बख़्त कहता है
कहने को उनसे चाहत
ज़बान का इल्म होना है
और लब्ज़ो की ज़रुरत

निगाहें झुक के उठ के
और झिझक कर जो मुड़ेगी
भला क्या उनसे मेरी
धड़कने ख़ाक छिपेंगी

उंगलिया कभी बालो से
कभी कंगन से उलझी
इतना सा ही काफी हो
और तुमने बात समझी

कदम जो मेरे लड़खड़ाते से रुके हैं
क्यों हम बेवजह दीवारों पे टिके है
छिपाते हैं क्या, क्या कहते है  तुमको पता है
ठिठक कर रूह के रिश्ते , तुम्ही से आ जुड़े हैं 

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