कौन मिट्टी गढ़ी मोरी  मूरत  हो श्याम 
बस सुगढ़ सलोनी, मोरी सूरत हो श्याम 
कैसे बांधे तूने बिखरे बिखरे से मोरे मन 
नैनो से दिन रात अब तो, झरत हो श्याम 

न जानूं मैं दिन, न जानू मैं रात 
रहूँ बेचैन, हर घडी सोचूँ बस तोरी बात 
भये कैसे निर्मोही  तुम,रंग मोहे श्याम रंग 
कारे रंग और कारे, मनवा भी तोरे श्याम 

न खोज खबर पूछी, न ही ध्यान ही धरो 
जाओ, अब न तुमसे बोलूंगी, चाहे पैयाँ पड़ो 
ऐसे बैरी सजन से , मैं अकेली भली 
भले तोसे, बिरह के मोरे रैन, हो श्याम 

कहा करते तो थे तुम, मोसे प्यारी न कोई 
कैसे मथुरा की मिट्टी, अब निगोड़ी है भाई ?
सुनते हो, तो सुन लो , बस इतनी दुहाई 
अब न आये, तो जमुना की गोदी में राधे सोई 

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