एक फुहार सी
बरसती है
कभी कभी
तेरी प्रीत
और मैं भींग जाती हूँ
मेरे रोम रोम तक
होकर मगन
होकर तृप्त
मेरे श्याम
खुद से ही लिपटकर
रीझ जाती हूँ
मेरे अंतर्मन तक
करके तेरा ध्यान
और अभिमान
होकर श्याम
एकाकार
अपने प्रेम से अपने ही मन को
सींच जाती हूँ
बरसती है
कभी कभी
तेरी प्रीत
और मैं भींग जाती हूँ
मेरे रोम रोम तक
होकर मगन
होकर तृप्त
मेरे श्याम
खुद से ही लिपटकर
रीझ जाती हूँ
मेरे अंतर्मन तक
करके तेरा ध्यान
और अभिमान
होकर श्याम
एकाकार
अपने प्रेम से अपने ही मन को
सींच जाती हूँ
Comments