सफ़ेद चादरों की सिलवटों में बस इंतज़ार ही है, की कुछ अंगड़ाई कभी टूटती. कुछ नयी सी सिलवटें , कुछ नयी सी ओस में चमकती इन धागों की भी लड़ियां।
औंधी पड़ी मीरा , बस यही सोचा करती है आजकल. सर्दियों की शामें और भी तनहा, और भी वीरान हो रखी हैं. न तितलियाँ हैं , न फूल और नहीं लम्बे वाले दिन. निगोड़ी बेइन्तेहाँ लम्बी रातें ज़रूर हो गयी हैं, इसमें इंसान सो न पाए तो ? शामत ही है समझो.
और एक टेक्स्ट मेमैसेज पलकों पे वैसे ही उभरता है, जैसे परसों फ़ोन पर आया था, एक लम्बी मीठी और हलकी सी टीस के साथ.

“आ जाओ “

आगे पीछे कई सारी और भी बातें है , लेकिन इन दो लब्ज़ो में जैसे कायनात की सारी बेचैनी और सारे अरमान भरे पड़े हैं. मीरा के, बस अकेले उसके। और कही कोई नहीं.

वो जानती है, कहने भर की बात है बस.

सब कहते है , ये लड़की ख़यालो में जीती है बस. पागल है, पत्थर की मूरत से दिल लगा बैठी है. दिल लगाना तक तो ठीक था , अब तो ज़िन्दगी दांव पर लगा बैठी है. न इसे पहर की खबर होती  है न कुछ होशो हवास।

उठती है मीरा , क्युकी चादर पर अभी भी उतनी ही सिलवटें है। ..वही की वही, जस की तस. जैसे परसो थी।  न वो कही जाती है, न कोई आता है.

लैपटॉप ऑन करके लिखने बैठती है फिर , मीरा के दोहे ... मतलब ब्लॉग. और बड़ी बारीकी से बयां करती है कृष का आना , उसके दिल का जोरों से धड़कना और कृष का कान लगा के सुनना उन्ही धड़कनो को. और फिर, हरेक धागे का तितर  बितर होकर झूम झूम कर नाचना , सर्दियों की रात का जग उठना , तितलियों से कमरा भर जाना और उड़ा ले जाना हर दर्द परेशानी और डर को. दूर कही दूर. घंटो कृष सुनाया करता है कहानिया बैठकर उसी सफ़ेद चादरों पर, और मीरा सुनती है कभी उसकी गोद में लेटी ... कभी उसके आँखों में डूबी. साँसे कुछ चल सी रही है और बह रहा है धमनियों में लहू कुछ गुलाबी गुलाबी होकर.

पोस्ट ऐसे ही कम्पलीट होता है और पब्लिश.

अब ये बात कौन नहीं जानता की मीरा और कृष कभी नहीं मिलते।

कहानी वही है, बस दौर बदल गया है.

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