स्कार्फ़
खास है दिसम्बर नहीं? एक ऐसा समय जब बीता साल लगभग छूट रहा होता है पर आने वाला साल नयी उम्मीदों के परवान चढ़ रहा होता है. माहौल खुशनुमा न सा होता है, ख़ास कर न्यू यॉर्क में. छुट्टियों के दिन , हर तरफ सजावट, लोगो की भीड़ भाड़, दोस्त परिवार सब के साथ भरा भरा सा संसार। लोग यु ही एक दूसरे को देख कर मुस्कराते है, समय जैसे थोड़ा मध्धम सी रफ़्तार पकड़ लेता है. सड़को पर चलते, कानो में सेंटा के बेल्स और साँसों में ताज़ी क्रिसमस ट्री की गंध भरना लाज़मी सा हो जाता है.
सर्दियों के दिन होते हैं और गर्माहट के लिए धरा कभी कॉफ़ी का कप तो कभी अपने जीन्स की पॉकेट में उंगलियां सेंकने को ढूंढती रहती हैं. घर से निकलते ही आज चेहरे पर बारिश की बुँदे दस्तक देती है.
बारिश?
नज़रे दौड़ाती है तो दूर दूर तक धुंध सा दीखता है, और मोर सा उसका मन अपने पंख पसारने को उठ बैठता है.
कार स्टार्ट करके निकलती है, विंडो पर वाइपर अपने आप बूंदो से लड़ना शुरू कर देते है और बजने लगता है रेडियो पर...
...नैनो ने बाँधी कैसी डोर रे, मुंसिफ ही मेरा.. मेरा चोर रे.
ट्रैफिक भी जैसे रूककर बारिश के मजे लेने लगती है, इन सड़को पर. लेकिन धरा को कोई शिकायत नहीं। मोर है वो तो और ऐसा दिन , भगवान ने खास उसके लिए ही भेजा है आज.
आज तो ऑफिस टाइम पे पहुँचने से रही. एक कॉफ़ी ले लूँ तबतक , हाथ ठंढे हो रहे हैं इस स्टीयरिंग को पकडे. राइट टर्न का इंडिकेटर ऑन करते ही , २-४ लोग शिकायती अंदाज़ में हांक करते है. धरा धीरे धीरे उनके बीच निकलती कॉफी शॉप के पार्किंग में गाड़ी खड़ी करती है. अब तक बारिश तेज़ हो गयी है और वो आंखे बंद करके उनकी आवाज सुनने में खो जाती है. तभी ध्यान टूटता है उसका, खिड़की पर हो रही दस्तक से.
अरे व्योम?
हड़बड़ाते हुए कार का दरवाजा खोलती है और व्योम कॉफ़ी का कप लिए पैसेंजर सीट में आ बैठता है.
क्या घटिया मौसम है.
क्या बात करते हो? कितना अच्छा मौसम है ये तो.
हाँ, तुम जैसे पागलो को तो लगेगा ही.
अबतक रेडियो में गाना बदल
...तू नज़्म नज़्म सा मेरे , होठो पे ठहर जा..
धरा की नज़रे कुछ देर ठिठकती है और अपने आप उंगलिया छू लेती है व्योम का स्कार्फ़. हलके हरे और बादामी रंग का स्कार्फ़ जो हलकी सी गांठ के साथ उसके गले में यु ही फंसा पड़ा है, एक निमंत्रण के साथ.
रोज़ स्कार्फ़ पहनते हो क्या ऑफिस में?
"नहीं, वैसे आज उतनी ठंढ नहीं. "
धरा बोलते बोलते, उसकी स्कार्फ़ खिंच कर अपने गले में बाँध चुकी है.
" फिर मैं ले लेती हूँ, कल वापस कर दूंगी "
व्योम बस हंस देता है.
स्कार्फ़ खोकर, वापस अपना कॉफ़ी का मग लिए अपनी कार में बैठता है और चल देता है अपने प्लान्स पुरे करने.
धरा अब सारा दिन अपनी उंगलिया और साँसे सेंक लेगी, कभी इन धागो में तो कभी इस जानी पहचानी खुशबु में.
और ऐसे पागलो की तरह मुस्कराने की वजह?
धत्त , बारिश जो हो रही है.
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