एक ट्रेन कथा
धरा बनर्जी फीमेल १९
रिजर्वेशन की लिस्ट में अपना नाम चेक करती है धरा की उंगलियां औरबेचैन सी थकी हुयी नज़रे। हावड़ा स्टेशन की भीड़ शाम के इस वक़्तकोई नयी बात नहीं है धरा के लिए , लेकिन आज कोई आम दिन नहींहै. आज उसका बीसवां जन्मदिन है.
पिछले एक हफ्ते से ही एक अजब उहा पोह में फंसा है उसका मन. जैसे कुछ दूर कही बुला रहा हो उसको. वैसे तो ऐसा एक महीने से चलरहा है जबसे कुछ लोग उसे देख कर गए हैं, शादी के रिश्ते की बात कोलेकर. एक अनजान से शादी या एक एकाकी सफर? उसने, २-३ बारये बात निकाली घर में लेकिन कौन सुनता है. सब तो बस उसकेसौभाग्य की दुहाई देने में ही व्यस्त हैं. इतना अच्छा घर, इतना अच्छालड़का भला और क्या चाहिए? महीने भर से धरा न किसी से बोली हैन मिली है. ऑफिस और घर बस. जानती है, उनके बात में कुछ झूठनहीं। उनकी कोई गलती भी नहीं.
दीदी जब जब ससुराल से आया करती है , ३-४ दिन तक बस बोलतीरहती है एकतरफा. वो तो देखती भी नहीं की उसका १ साल का बेटादूध के लिए रो रहा होता है. धरा की ही जिम्मेदारी है वो भी, जो उसकेचेहरे पे हंसी भी ले आती है और आवाज में खनक. तभी तो उसके लिएतरह तरह के गाने गाना और सुलाना उसका रोज़ है. उसके चले जानेसे, बड़ा सूना सूना सा लगता है धरा को. लेकिन दीदी की हताश सीहालत उससे कुछ छिपी नहीं है. पर उसे ये भी नहीं पता की, सही क्या हैऔर गलत क्या? सब तो यही करते हैं. और धरा के पास तो आलरेडीनौकरी है , चिंता कैसी? जहाँ जायेगी इंडिपेंडेंट वीमेन ही रहेगी वो. सभीनाज करते हैं उसपर. इसीलिए वो कुछ बोलती नहीं, सबकी ख़ुशी में हीमेरी ख़ुशी है. है न ?
लेकिन, अंदर अंदर एक अजीब सा बवंडर उठ रहा है जिसकी वजहसमझ नहीं आ रही. सबकुछ तो सही है ,नहीं?
" माँ सुनाओ मुझे वो कहानी, जिसमे राजा न हो रानी..." गाते गातेऔर थपकियाँ देते न जाने कब उसकी आँख लग जाती है.
पास के कमरे में दीदी सोयी है. वैसे तो ये तीनो साथ ही सोया करते थे, पर आज सुबह जीजाजी आये हैं.
कमरे से अचानक कुछ अजीब सी आवाज आती है , कोई चीखा क्या? नहीं , ऐसा लग रहा है किसी का दम घुट रहा हो.
उसकी नींद टूट जाती है और फिर बड़ी देर तक वह बिस्तर पर बैठीरहती है. अँधेरे में ही, लेटने की भी हिम्मत नहीं है वापस उसमे।
भोर होते ही वो बिना कुछ सोचे समझे एक टिकट बुक कर लेती हैदिल्ली का.
दिल्ली से कहाँ जायगी पता नहीं , लेकिन फिलहाल दिल्ली ही सबसेज्यादा दूर लग रहा है कोलकाता से. वहां जाकर देखूंगी और कितने दूरजा सकती हूँ.
किसी तरह बैग लेकर अंदर आती है और सीट पर बैठते ही उसकी नज़रेठिठक जाती है, एक झुण्ड घुंघराले बालो वाले सर पे जो खिड़की सेबाहर झाँक रहा है. बालो का रंग बिलकुल सन के जैसा सुनहरा है. धरासामने बैठती है तो वो पलटती है और दोनों एक दूसरे को एक पलदेखते हैं. उसकी हलकी नीली आँखों से जैसे साफ़ दिख रही होती है,उसकी मासूमियत. वो सर वापस खिड़की की तरफ घूम जाता है, एकस्कार्फ़ से वो अपने बालो को भी लपेट लेती है इसबार।
धरा समझ जाती है वजह, जो भी कम्पार्टमेंट में गुजर रहा होता है एकबार उसकी तरफ देखे बिना नहीं जाता। ..अब ऐसे अकेली लड़कीकोलकाता की ट्रेनों में कहाँ दिखती हैं। साफ़ जाहिर है , यहाँ की नहींहै.
ट्रैन निकलती है और अब इस कम्पार्टमेंट में यही दोनों है. साइड का एकबर्थ खाली पड़ा है.
धरा धीरे धीरे प्लेटफार्म को पीछे खिसकता देखती है , किताबो कीदूकान। सामने पड़े लिटिल हर्ट्स के पैकेट और टिन की संदूक पर बैठेपरिवार. सूती की साड़ी और बड़ी सी बिंदी लगाए माँ, पास मेंचहलकदमी करता पिता और लिटिल हर्ट्स की जिद लगाए एक छोटीसी बच्ची। कॉमिक्स लेकर पढता उसका भाई और उसके बालो कोसवारती उसकी बड़ी बहन, सब धीरे धीरे उसकी नजरो के सामने सेखिसकता चला जा रहा है और वो भी उनके साथ. शायद कन्फर्मटिकट नहीं थी और वो जनरल के डब्बे में बैठ नहीं पाये. शायद, अगलीट्रैन में जगह मिल जाए. शायद, क्या जाने। कौन जाने।
इतने में सोने के बालो वाली लड़की धरा से पूछती है,
" डु यू नो , व्हेरे इस रेस्टरूम ?"
धरा कुछ समझ नहीं पाती. अवाक सी देखती है बस.
"बाथरूम"?
धरा इशारा करती है.
"प्लीज वाच माय बैग" कहकर वो उठकर चल देती है. लेकिन एकबटुआ अपने साथ ले जाती है. अनजान लोगो पर इतना भी भरोसा नहींहै इसे. अच्छा है, होता तो फ़िक्र वाली बात थी.
इतने में, एक लड़का दुबला सा, लगभग ५ फ़ीट ८ इंच का कुछ ढूंढतासा उसी बर्थ पे आ बैठता है.
धरा को ये नया हमराह कुछ पसंद नहीं आता, ऊपर से ये सीट तो किसीऔर की है.
"ये आपकी सीट है? यहाँ कोई और है। .. आप टिकट चेक कर लेजरा."
वो देखता तक नहीं, बस अपना बैकपैक लिए ऊपर जगह ढूंढ रहा है कीकहाँ रखे.
"आपने सुना नहीं शायद? यहाँ कोई और है"
इसबार वो पलटता है, और वो तीखी नजरे एक पल को धरा कीबोलती बंद कर देती है.
"अच्छा? देखता हूँ..."
इतने में सोने के बाल वाली वापस डब्बे में आती है।
"आई एम केरेन, हियर इस माय टिकट... कैन आई सी योर ?"
धरा को इतनी सी देर में न जाने क्या हमदर्दी हो गयी है सोने के बालवाली से. आखिर अनजान देश में है और अपना बैग भी तो मेरे भरोसेरख गयी थी. अब ये न जाने क्या बताये इसको. बंगाली तो दिख नहींरहा ये , न जाने कौन कैसा है.
तीनो सर एक साथ दोनों टिकट को देखते है.
केरेन ओ' राईली और व्योम तलवार। तो केरेन बनारस जा रही है औरये जनाब दिल्ली तक. उफ़, केरेन के जाने के बाद मुझे अकेले इसकेसाथ घंटो बैठना पड़ेगा इस डब्बे में. मैं बनारस ही चली जाती इससेअच्छा.
" .. अरे व्योम आपकी तो वो साइड वाली बर्थ है."
"हाँ, शुक्रिया"
धरा आंखे घुमाती है , अब ये आजकल शुक्रिया कौन कहता है. कौन सेइतिहास की किताब से निकला है ये करैक्टर भला , या किसी ग़ज़लसे? न , पक्के से किसी कार्टून की किताब में रहा होगा. सोच कर उसेहंसी आती है और व्योम चुपचाप अपना बैग लेकर कुछ ओझल सा होजाता है.
धरा बैग से सिद्धार्थ की किताब निकाल कर पढ़ना शुरू करती है, औरट्रैन धीरे धीरे स्पीड लेकर एक स्थगित सी रफ़्तार पकड़ लेती है. कुछवैसे ही जैसे अनजान पटरियों पर जाने वाले अनजान यात्रियों का साझासा सफर और आती जाती साँसे और धड़कता हुआ ह्रदय।
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