हमको समझाने एक दिन
कई दोस्त आये थे
मेरी खामियों की लिस्ट
फेहिरस्त, लाये थे

कुछ ने दी हिदायत
कुछ ने सलाह दी
कुछ ने धमकी सीधी
शिकायत बेपनाह की

मेरे सारे गुनाहों को
एक एक, याद दिलाया
मेरे उड़ते चेहरे का रंग
कोई भांप न पाया

जब चले गए तो झट से
मैंने सांकल लगायी
कितनी, कितनी तनहा थी
सोच कर खुद पर हंसी आयी

ये दोस्त कहाँ, ये आये थे
झूठी रश्मों के चौकीदार
नंगी खड़ी थी मेरे सामने
हम रिश्तों की दरार

फट रहा थे कलेजा
पर एक तसल्ली थी
सच साथ मेरे था
और मैं सच में, अकेली थी








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