विद्रोहिणी - पार्ट १
अच्छा? हाय , ऐसा कैसे कर डाला उसने ? हम - तुम जैसी ही तो थी?
अचार की बर्नी में आम की दो और फांक ठूंसते हुए बोली, पल्लो.
धुप बड़ी तेज़ है आज छत पर. इतनी की आज तो कौए भी नहीं आये हैं.
हाँ, अब ऊपर ऊपर कुछ पता कहाँ चलता है. किसके घर में क्या चल रहा है.
गुड्डो अपना पसीना साड़ी के कोने से पोंछते हुए बोली।
छत के दूसरे कोने पर एक सूखती हुयी साड़ी की छाँव में बैठी प्रीतो , अभी भी अपनी रोमांटिक नॉवेल के पन्ने पलट रही थी.
अरे प्रीतो दीदी , आपको कुछ खबर नहीं थी? आपके घर तो अक्सर आना जाना लगा रहता था उसका?
अपना चश्मा ऊपर खिसकाते हुए, एक जम्हाई लेती है प्रीतो.
पल्लो का ध्यान सीढ़ियों की तरफ जाता है , धप धप की आवाज तेज़ और तेज़ हो रही है. कोई भागते हुए सीढिया चढ़ रहा है शायद. शायद नहीं, निश्चित ही.
हाँफते हुए रीतू भड़ाक से दरवाजा खोलकर , लगभग गिरती पड़ती हुयी सी आती है छत पर.
अरे रितु दी , ये कोई उम्र है इस तरह उछल कूद की?
पल्लो अपनी ठिठोली की आवाज में कहती है.
अब कहीं जाके प्रीतो का ध्यान बंटता है. नॉवेल को किनार पे रख वो भी अब सुनना शुरू करती हैं.
रितु दी क्या हुआ?
पल्लो तुरंत ठिठोली छोड़ अपने केयर गिवर मोड में स्विच होती है.
" हाय गुड्डो. देख तो। जरा सुराही से ठंढा पानी का एक गिलास तो लाना। "
गुड्डो, पान की पीक छत के कोने में थूकती हुयी धीरे धीरे से उठती है.
पल्लो का आलाप जारी है.
प्रीतो दीदी देखिये न , कुछ तो हुआ है. वरना ऐसे भाग के क्यों आती दीदी? हाय दीदी , क्या करें ? बताईये न? गुड्डो। ...
रितू इतने में अपने बाल ठीक करके सीधी हो , मचिये पे बैठ चुकी हैं।
लेकिन पल्लो अभी अपने बोले जा रही है. उसने देखा भी नहीं की , गुड्डो पानी लेकर आ चुकी है.
प्रीतो भी अपना भारी बदन लिए मचिये के पास आ बैठी है
हाँ दीदी , कहिये तो क्या हुआ ?
गुड्डो के हाथ से गिलास ले प्रीतो , रितू को थमा देती है. गुड्डो अपना पान चबाती , नज़रे घुमाती जरा दूरअपने पुराने वाले कोने में जाकर बैठती है.
"हाय कितनी प्यारी है रे तू पल्लो , कितनी चिंता की तूने मेरी। " कहती हुयी रितू गट गटकर पानी का गिलास खाली कर डालती है
पल्लो जरा गर्व में इठलाती खाली गिलास रितू चरणों में बैठ जाती है . एक नजर कनखियों से गुड्डो पर भी डालती है. गुड्डो अपना पान चबाती और मुस्कुराती उसे देखती है, पल्लो वापस अपना फोकस रितू पर ले आती है।
अरे नहीं दीदी , मुझे तो बस चिंता हो गयी आपकी न. आप ऐसे जल्दी जल्दी आई। कहीं चोट लग जाती
उसे बीच में रोककर , प्रीतो वापस पूछती है "दीदी , कहिये तो क्या हुआ ?"
रितू के मुंह से "पुलिस" शब्द फूटता भर है की पल्लो वापस शुरू हो जाती है
"हाय राम दीदी , पुलिस। .कहाँ ?"
" अरे , वही मीरा के घर के बाहर। .. अभी देख कर आ रही हूँ। . उसका तो नाटक लगा ही रखा है न "
"हाँ दीदी , पता नहीं क्या तमाशा लगा रखा है उसने भी " अब पल्लो ठंडी सांस लेकर कहती है और गले में पहने पति के तस्वीर वाली लॉकेट को एकबार आँचल से पोंछ लेती है और वापस ब्लाउज़ में गाड़ देती है।
गुड्डो देख रही है अभी दूर से , ठहाके लगाकर कह उठती है.
"ओहो , तो विद्रोहिणी ने फिर कुछ कर डाला "
धुप बड़ी तेज़ है आज छत पर. इतनी की आज तो कौए भी नहीं आये हैं.
हाँ, अब ऊपर ऊपर कुछ पता कहाँ चलता है. किसके घर में क्या चल रहा है.
गुड्डो अपना पसीना साड़ी के कोने से पोंछते हुए बोली।
छत के दूसरे कोने पर एक सूखती हुयी साड़ी की छाँव में बैठी प्रीतो , अभी भी अपनी रोमांटिक नॉवेल के पन्ने पलट रही थी.
अरे प्रीतो दीदी , आपको कुछ खबर नहीं थी? आपके घर तो अक्सर आना जाना लगा रहता था उसका?
अपना चश्मा ऊपर खिसकाते हुए, एक जम्हाई लेती है प्रीतो.
पल्लो का ध्यान सीढ़ियों की तरफ जाता है , धप धप की आवाज तेज़ और तेज़ हो रही है. कोई भागते हुए सीढिया चढ़ रहा है शायद. शायद नहीं, निश्चित ही.
हाँफते हुए रीतू भड़ाक से दरवाजा खोलकर , लगभग गिरती पड़ती हुयी सी आती है छत पर.
अरे रितु दी , ये कोई उम्र है इस तरह उछल कूद की?
पल्लो अपनी ठिठोली की आवाज में कहती है.
अब कहीं जाके प्रीतो का ध्यान बंटता है. नॉवेल को किनार पे रख वो भी अब सुनना शुरू करती हैं.
रितु दी क्या हुआ?
पल्लो तुरंत ठिठोली छोड़ अपने केयर गिवर मोड में स्विच होती है.
" हाय गुड्डो. देख तो। जरा सुराही से ठंढा पानी का एक गिलास तो लाना। "
गुड्डो, पान की पीक छत के कोने में थूकती हुयी धीरे धीरे से उठती है.
पल्लो का आलाप जारी है.
प्रीतो दीदी देखिये न , कुछ तो हुआ है. वरना ऐसे भाग के क्यों आती दीदी? हाय दीदी , क्या करें ? बताईये न? गुड्डो। ...
रितू इतने में अपने बाल ठीक करके सीधी हो , मचिये पे बैठ चुकी हैं।
लेकिन पल्लो अभी अपने बोले जा रही है. उसने देखा भी नहीं की , गुड्डो पानी लेकर आ चुकी है.
प्रीतो भी अपना भारी बदन लिए मचिये के पास आ बैठी है
हाँ दीदी , कहिये तो क्या हुआ ?
गुड्डो के हाथ से गिलास ले प्रीतो , रितू को थमा देती है. गुड्डो अपना पान चबाती , नज़रे घुमाती जरा दूरअपने पुराने वाले कोने में जाकर बैठती है.
"हाय कितनी प्यारी है रे तू पल्लो , कितनी चिंता की तूने मेरी। " कहती हुयी रितू गट गटकर पानी का गिलास खाली कर डालती है
पल्लो जरा गर्व में इठलाती खाली गिलास रितू चरणों में बैठ जाती है . एक नजर कनखियों से गुड्डो पर भी डालती है. गुड्डो अपना पान चबाती और मुस्कुराती उसे देखती है, पल्लो वापस अपना फोकस रितू पर ले आती है।
अरे नहीं दीदी , मुझे तो बस चिंता हो गयी आपकी न. आप ऐसे जल्दी जल्दी आई। कहीं चोट लग जाती
उसे बीच में रोककर , प्रीतो वापस पूछती है "दीदी , कहिये तो क्या हुआ ?"
रितू के मुंह से "पुलिस" शब्द फूटता भर है की पल्लो वापस शुरू हो जाती है
"हाय राम दीदी , पुलिस। .कहाँ ?"
" अरे , वही मीरा के घर के बाहर। .. अभी देख कर आ रही हूँ। . उसका तो नाटक लगा ही रखा है न "
"हाँ दीदी , पता नहीं क्या तमाशा लगा रखा है उसने भी " अब पल्लो ठंडी सांस लेकर कहती है और गले में पहने पति के तस्वीर वाली लॉकेट को एकबार आँचल से पोंछ लेती है और वापस ब्लाउज़ में गाड़ देती है।
गुड्डो देख रही है अभी दूर से , ठहाके लगाकर कह उठती है.
"ओहो , तो विद्रोहिणी ने फिर कुछ कर डाला "
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