विद्रोहिणी २
मीरा को सत्रह दिन हो गए, छत पर नहीं आयी.
पल्लो अपनी अचार की बरनियो को धूप लगाने रोज ही आती है और आते जाते झाँक ज़रूर आती है गुड्डो के घर में. लेकिन मीरा के घर का झरोखा बंद का बंद है. बस बच्चो को समय पर स्कूल की बस में सवार होते और उतरते देखा है उसने। दोनों भाई भोली सी हंसी लिए हाथो में हाथ डाले आया जाया करते है. पल्लो की आठ साल की मुन्नी मीरा के बड़े बेटे के साथ ही बस में जाती है , उसको जनम दिन में हाथो से बनाकर कार्ड भी दे गया था वो. मुन्नी बड़ी खुश उतरी थी उस दिन बस से, लेकिन मीरा आयी नहीं हर साल की तरह केक लेकर. केक बनाने का बड़ा शौक है उसको.
आज तो देख ही आती हूँ की माजरा क्या है. जबसे पुलिस वाली बात सुनी है , इधर उधर से जितना सुना सब मिला जुला सा लग रहा है
अंदर से इंदु की आवाज साफ़ साफ़ सुनाई दे गयी पल्लो को, ठिठक गयी दो मिनट.
"कभी सोचा है तुमने की तुम्हारे मम्मी पापा का क्या होगा? "
"क्या होगा, दीदी?" - मीरा कहती है. आवाज में कोताही , घबराहट और कमजोरी का लेशमात्र नहीं है. पल्लो का कलेजा यह सुनकर और भी तेज़ धड़क उठता है.
"कैसा सदमा लगेगा उनको. "
"कैसा सदमा? "
"अरे? बकवास बंद करो. अधेड़ हो रही बेटी अपने हाथो से अपना घर उजाड़ रही है , ये किसी भी वृद्ध माँ बाप का कलेजा काट कर रख देगा. इस उम्र में ये सब दिन दिखाओगी उनको? "
"पता है दीदी , वो अधेड़ बेटी किसी दिन जवान थी. और तब उसके माँ बाप ने उसका हाथ किसी बोरी की तरह एक अनजान को थमा कर तसल्ली कर ली थी. कलेजे का टुकड़ा फलाना ढिमकाना। .. मुझे नहीं लगता है, की उनका कलेजा इतना कमजोर कलेजा है. "
"कुछ भी कहे जा रही हो , वही तो दुनिया की रीत है और देख सुन कर ही ब्याहा था तुम्हे। अच्छा घर अच्छा वर , प्यारे से बच्चे। कमी कौन सी रह गयी थी ? सौर समाज , लोग बाग़."
मीरा टोक देती है बीच में अब, आवाज में जरा सी थरथराहट बढ़ गयी है. ऐसी आवाज एक बार सुनी थी पल्लो ने उसकी, उस दिन जब पल्लो ट्रैन स्टेशन पर खड़ी दी और बड़ी तेज़ हवाएं चल रही थी. खैर, वो तो दसरी बात थी.
"हाँ, लोगो की बात तो है. ये बात ज़रूर ठेस पहुचायेगी उन्हें की भागलपुर वाली मौसी और पटना वाली मामी को कही भनक लग गयी तो क्या कहेंगे। लेकिन क्या है न दीदी, मैं इतनी दूर हूँ की कानो कान खबर तक न होने दूंगी किसी को. और मेरा तो सबसे छूटे अरसा हो गया , करा दूंगी तसल्ली अम्मा को. बस?"
"तुमने मजाक समझा है क्या शादी व्याह के रिश्ते को? नोक झोक कौन से घर में नहीं होती , लोग सुलह करते है. आपस में न हो पाए तो बड़े बुजुर्ग दोस्त साथ से बात की जाती है, ये क्या बात हुयी की तुमने पुलिस कचहरी कर डाली?"
खिलखिलाकर हंस पड़ती है मीरा।
"क्या दीदी, आपको भी डर लगता है पुलिस कचहरी से?"
इंदु को कुछ नहीं सूझता शायद, खिड़की के बाहर से सुन रही पल्लो सावधानी से वही सीढ़ियों पे बैठ जाती है.
"यही पुलिस कचहरी है की मुझे लगता है शायद मेरे हिस्से में भी सांस लेने को एक मुट्ठी हवा आएगी, मांग कर नहीं छीनकर लेना चाहती हूँ मैं मेरे हिस्से की हवा. बहुत मांग लिया, बहुत मिन्नतें कर ली, बहुत उम्मीदे लगा ली , बहुत राह देखी ... अब नहीं होता। अब तो। .."
"चुप करो, आखिर में उसके लिए तुम रहोगी और तुम्हारे लिए वो.
मीरा की आवाज भर्रा उठी है , और शायद अब उसकी आँखों से कुछ गर्म आंसू बह चले होंगे।
"मैं तो रहूंगी ,लेकिन वो मेरे लिए? अच्छा मजाक कर लेती हैं. और जान लीजिये, मेरा प्रेम और मेरा ह्रदय एक कागज़ के पुर्जे का गुलाम नहीं है. वो जाने न जाने, मैं रहूंगी.
"ठीक है , जैसी तुम्हारी मर्ज़ी. मैं इस पागलपन में तुम्हारा साथ नही दे सकती। तुमने अपनी राह चुन ली है "
इंदु दीदी के मुंह से ऐसी बात निकलेगी , कल्पना नहीं की थी पल्लो ने. पल्लो का मुंह खुला का खुला रह जाता है, और धीरे धीरे सीढियाँ उतरती हुयी अपने घर आ जाती है और किवाड़ लगा लेती है.
छोले जो उसने रात भिगो रखे थे , अब बना लेने चाहिए उसको. परसो गुड्डो ने बनाया था, बड़ी अच्छी खुशबु आ रही थी उसके घर से. पूछ लूँ क्या कौन सा मसाला डाला था उसने ? जाने दो, क्या पूछना। हुंह मुझे आता नहीं क्या बनाना ? इनको तो मेरे बनाये ही छोले पसंद आते है. कभी कभी मीरा के घर भी दे आया करती थी, खैर अब तो कहानी ही अलग हो गयी है.
सोचते हुए प्याज काटने बैठ जाती है. पास में बैठी मुन्नी अपने गुड़िया घर के पीछे बड़ा सा गराज बनाने में जुटी है. लाड से उसे देखती है और बहते आंसुओ का सारा दोष प्याज के मत्थे मढ़ देती है चुपचाप, पल्लो.
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