तुम रोक लो
यु ही बीत जाया करेंगी शामें
और शायद, जिंदगी की शाम भी
उस शाम भी
तुम कहना ,हम सुनेंगे
लेकिन सुन लो
सुबह कैसी भी हो
वो बस मेरी होगी
जब मेरे इशारे का इंतज़ार
करता सूरज , वक़्त को रोके
देखा करेगा , तबतक जबतक
मैं न कहूँ , ये रात इतनी ही थी
हमारी बात , इतनी ही थी
और आते ही धूप परदो से
मैं चुप हो जाउंगी , की तुम रोक लो
मुझको कहना न पड़े, तुम रोक लो
और मैं फिर चुपचाप रुकी रहूँ
किसी दरवाजे की ओट में
और तुम बाते करते रहो
चाहे जितनी , शाम तक
उजालो की , ठहाकों को
समंदर की, किनारों की
और फिर ढलते ही शाम के
सौंप दो सारे अँधेरे की मैं
रोशन करू उनको
कभी फूलों के पायल से
कभी नीले से काजल से
कभी एक लौ हो रोशन सी
कभी कोई दाग होठो की
कभी फिसलती सी उंगलिया
कभी उलझती सी बालिया
कभी सांसे बहकती हो
कभी धड़कन ठहरती हो
रोशन रहे बस रात
की मैं सुबह को
फिर चुप हो सकूं
इठलाते हुए
तुम से कहूँ
फिर रोक लो
बस रोक लो
तुम रोक लो
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