रिश्ता कुछ भी हो
उसका नाम हो या नहीं
वैसे भी वो सब
ज़माने के कायदे भर हैं
खोखले , बेवजह , बेबुनियाद
आज दिए और कल ले भी लिए.
लेकिन वादा , अपना है
और मजबूत इरादा भी
की, खुशिया
आशाएं , सपने और भरोसे
बने रहे , न हो टस से मस
क्युकी, ये मेरे अपने है
आजाद बनावटी रिवाज़ो से
सगे , आत्मा की आवाजों से
सूरज की रौशनी सी नियमित
प्रकृति की नियमों में सीमित
प्रेम, का क्या है
वो तो मिट्टी के माधो से भी होता है
पहले हम ढंग से करना तो सीख ले?
एक बार कभी , मीरा बनकर तो देख ले
जरुरत, चाहती है - मांगती है
प्रेम, तो बस उमड़ पड़ता है
उझल देना चाहता है
और बिखर जाने में ही उसका निमित्त है
और कहीं कोई समेट ले
तो बस
Comments