जब तलक रूह है जिन्दा और साँसे बदन में 

यु ही तनहा तड़पने की ज़रुरत क्या है 

आजाऊंगी सजाके मैं मेहँदी, ओढ़े घूंघट 

बस तुम कह दो, मिलने की मुहूरत क्या है 


न चरागों से मांग कर रौशनी 

एक अपना दिया जलाया होता 

न उम्मीद उनसे प्यार की करते 

खुद को सीने से लगाया होता 


न बिखरते यु टूटकर के हम 

न अँधेरे यूँ किस्मतो में होते 

शुकूं से उम्र अपनी भी कटती 

काश, दिल ही न लगाया होता 


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