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इंतज़ार

 कब से  कब तक  और कितना  इंतज़ार  और क्या मिलने से  इंतज़ार ख़तम हो जाता है?  और क्या इंतज़ार न करने से  इंतज़ार ख़तम हो जाता है?  तुम हसते रहे, सबके साथ  वक़्त यु गुजारा किये  की बस, जो है यही है  और कही कुछ भी नहीं है  वही पर हमने, लिखा, कहा  एक एक दिन को कागज पर नापा  उसको पहचान दी, नाम दिया  तो क्या हुआ? तुम्हे जिरह तक करनी पड़ी  बताना पड़ा मुझे  मैं बस अभी नहीं हूँ, लेकिन हूँ  मैंने सौ दफा तुम्हे याद दिलाया  बेकार की बाते तुम्हे बताती रही  कभी शिकायती अंदाज में  कभी आँखों में आंसू भरकर  तो कभो ये कहकर की  चलो, अब जान में जान आयी  सच तो है की  मेरा इंतज़ार तुम्हारे इंतज़ार से  ज्यादा और बड़ा नहीं हो गया जैसे  हवा थी  सांस है  कभी तेज़ कभी कम  कभी सन्नाटे में गूंजती हुयी कभी शोर में दबती हुई  वैसे ही  इंतज़ार था  और शायद थोड़ा सा रह जायेगा  मिलने के बाद की  करेगा इंतज़ार, क्युकी वो  कम्बख्त  कभी ख़तम होता है क्या?...