कोलकाता - मेरी जन्मभूमि. कभी भी मेरे पास पर्याप्त शब्द नहीं होंगे यह व्यक्त करने को, की क्या क्या मिला है मुझे बस वहां जन्म लेकर. कितने गौरव और कितने आह्लाद से आज भी वहां की हवा के स्मरण मात्र से जैसे जीने की अभिलाषा पुनः जीवित हो जाती है. हाँ, उसी धूल कोलाहल और पसीने में सनी हवा. भाषा यु तो मैंने वहां की सीखी ज़रूर पर निभाई हिंदी के साथ, पर जहाँ बात भावनाओ की आती है और अपने घर की वो तो बस एक ही है. साक्षात् भगवती का घर, दखिनेश्वेर का ईंट वाला लाल आंगन और मटमैली गंगा की निरंतर बहती तटस्थता. अपना तो बस वही घर है... जो है. इस हाड मांस के शरीर में जो आत्मा अविचल धधकती है वो शायद वही रचने बसने को तरसती है. जो भी अध्याय आजतक लिखे, उस लेखनी में स्याही इन्ही अनुभवों का है जो मुझे वहां की हवा मिटटी ने दिए. वही ढोये बाँटते और सुनते चलती हूँ.... मांझी रे
इंतज़ार
कब से कब तक और कितना इंतज़ार और क्या मिलने से इंतज़ार ख़तम हो जाता है? और क्या इंतज़ार न करने से इंतज़ार ख़तम हो जाता है? तुम हसते रहे, सबके साथ वक़्त यु गुजारा किये की बस, जो है यही है और कही कुछ भी नहीं है वही पर हमने, लिखा, कहा एक एक दिन को कागज पर नापा उसको पहचान दी, नाम दिया तो क्या हुआ? तुम्हे जिरह तक करनी पड़ी बताना पड़ा मुझे मैं बस अभी नहीं हूँ, लेकिन हूँ मैंने सौ दफा तुम्हे याद दिलाया बेकार की बाते तुम्हे बताती रही कभी शिकायती अंदाज में कभी आँखों में आंसू भरकर तो कभो ये कहकर की चलो, अब जान में जान आयी सच तो है की मेरा इंतज़ार तुम्हारे इंतज़ार से ज्यादा और बड़ा नहीं हो गया जैसे हवा थी सांस है कभी तेज़ कभी कम कभी सन्नाटे में गूंजती हुयी कभी शोर में दबती हुई वैसे ही इंतज़ार था और शायद थोड़ा सा रह जायेगा मिलने के बाद की करेगा इंतज़ार, क्युकी वो कम्बख्त कभी ख़तम होता है क्या?...
Comments
sanskaar, sanskriti, prem, kawya aur kala ka misran kolkata.