जब समाज हो जाये

अपनों से बढ़कर

जब सम्प्रदाय हो

संस्कारो से ऊपर

जब मर्यादा की हो जाये

प्रीत से टक्कर

और बिश्वाश न हो पाए

दृढ़ता से तत्पर

विनाश

सुनिश्चित


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