हाय कौन सा रंग भर गए
मोहन हमारे होठ में
आईना चुप हो गया है
सखियाँ गयी सब रूठ के

धो धो के, पोंछ पोंछ कर
थक के अब मैं हारी रे
अब तो सारे जग ने जानी
मैं श्याम, तोरी बावरी रे

किस जनम का बैर है जो
इतना सताते हो हमें
बांसुरी की धुन पे लाखों
रतियाँ जगाते हो हमें

मारे जलन उस बांसुरी के
अब मरी जाती हूँ रे
होंठ पर तुझको धरे
तेरी हुए जाती हूँ रे 

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