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एक   ट्रेन   कथा धरा   बनर्जी                 फीमेल                      १९ रिजर्वेशन   की   लिस्ट   में   अपना   नाम   चेक   करती   है    धरा   की   उंगलियां   और बेचैन   सी   थकी   हुयी   नज़रे।   हावड़ा   स्टेशन   की   भीड़   शाम   के   इस   वक़्त कोई   नयी   बात   नहीं   है   धरा   के   लिए  ,  लेकिन   आज   कोई   आम   दिन   नहीं है .   आज   उसका   बीसवां   जन्मदिन   है . पिछले   एक   हफ्ते   से   ही   एक   अजब   उहा   पोह   में   फंसा   है    उसका   मन .  जैसे   कुछ   दूर   कही ...
कुनमुनाता सा उठा है दिल में पुराना कोई जोश हाय अब अर्सो के बाद आया है फिर से जैसे होश सर्दियों की भोर ये और रूह तक की कपकपी आरज़ू की आंच में अब लम्हात की रोटी सिंकी बस सुक़ून थोड़ा सुक़ून तुझको मिले मुझको मिले खुद से फिर जी भर मिले भूल कर शिक़वे गिले 
हाईवे से एयरपोर्ट का एग्जिट लेते ही, धक् से हो जाता है व्योम. व्योम का भी कुछ छूटा जा रहा है आज. चाभी, वॉलेट, पासपोर्ट, लगेज, सब तो है ? है। सब है. टाइम पे पहुँच भी जायेगा, सब कुछ जैसे प्लांड था वैसे ही है. बस इस छूटे जाने के एहसास को छोड़कर. क्या कह रही थी वो? मैं कहाँ सुन पा रहा था जब वो कह रही थी, मैं तो बस देख रहा था उन होठों को खुलते बंद होते। मैं तो बस देख रहा था उन पलकों को उठते गिरते और मैं सुनता भी कैसे ? जब उसकी उंगलियां मेरे हाथो पे चहलकदमी किया करती है, मुझे कुछ सूझता कहाँ है और बस जी में आता है इनकी चहलकदमी को तभी का तभी अपनी मुठ्ठियों में कैद कर लूँ , इन होठों को वही रोककर अपनी पलकों से उसकी पलकें बंद कर के सुनु सिर्फ आती जाती साँसे। सुनना तो दूर, क्या बोलता हूँ वो भी याद नहीं रहता. सच में? एक ही कहानी बार बार कहता हूँ क्या उसको? वो तो ऐसा ही बोल रही थी लेकिन मुझे कहाँ याद. हर बार नयी सी लगती तो है मुझे, जब भी कुछ कहता हूँ. वो सुन भी रही होती है, उसकी आँखों का इंतज़ार शायद मुझे कंफ्यूज कर देता है। .. की ये कहा भी था या नहीं? क्या फर्क पड़ता है, मुझे नहीं लगता की वो...