प्रिय चाह जो है तुमको मैं हाथो से अपने वो उबटन लगाऊं बदन पे तुम्हारे हल्दी में जिसके तन ये मन, मेरा रंगा है और जब मैं रंगूंगी उंगली से अपने प्रेम विलीन हो बंद करके पलके खोलकर आंखे, तुम देखोगे और कहोगे नहीं ये तो वो रंग नहीं है क्युकी उबटन , हे प्रिय मेरे प्रेम का, मेरे शरीर पर दमकता है ऐसा कुंदन सोने सा जलता जो है दिवस रात्रि, प्रेम प्रेम में भीग भीग , जलता है तुम जले हो क्या कभी, इतना ? तो फिर? कैसे? जाओ नहीं लगाती मैं और
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Showing posts from November, 2019
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हाय कौन सा रंग भर गए मोहन हमारे होठ में आईना चुप हो गया है सखियाँ गयी सब रूठ के धो धो के, पोंछ पोंछ कर थक के अब मैं हारी रे अब तो सारे जग ने जानी मैं श्याम, तोरी बावरी रे किस जनम का बैर है जो इतना सताते हो हमें बांसुरी की धुन पे लाखों रतियाँ जगाते हो हमें मारे जलन उस बांसुरी के अब मरी जाती हूँ रे होंठ पर तुझको धरे तेरी हुए जाती हूँ रे
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Start over Start over as the shiva destroys After the dance of rage Burns to ashes, everything good and bad Behold and know, everything comes to an age The snakes hiss, the snakes may bite The fear multiplies, crippling psyche The clouds dark grey Surround you in rolling thunder For a long long time We choose to bury, under And then the moment arrives When you choose to break away Burn down, rip apart For whatever, it takes One must lose control To gain it back The first day falls Only after it is pitch dark Life is a gift, bestowed upon us The beautiful journey, worth every minute With love, gratitude and peace I accept my life, as it is , as it is
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सुबह हो गयी क्या? उनींदी सी , राधा पूछती है. पर कोई जवाब नहीं आता. कुहनियां उठाकर देखती है, अयान गहरी नींद में हैं. राधा आंखे बंद कर लेती है, कुछ घड़ी के लिए. कैसा होगा जमुना में उतरता इस उगते सूरज का प्रतिबिम्ब? देखा तो है कई बार. ऐसे ही उनीदी आँखों से, उसकी आँखों में. कई बार. ऐसे जैसे कह रहा हो, राई जागो गो .. जाऊं? कहाँ जा रही हो ? राधा सुनती है, आंचल को अपने सर पर थोड़ा और खींच कर पलटती है. पानी...लाना होगा न. अभी चली जाऊं? या। अयान जा चुका है. राधा ठिठक कर सोचती है थोड़े देर. फिर न जाने किस ग्लानि में धम्म से वही बैठ जाती है. क्या करूँ ? कितने दिन हो गए , उस रस्ते की मिट्टी इन पैरों से नहीं लगी. सोचते सोचते उंगलियां अपने आप उसके आलता लगे पैरों पे रेंगने लगती है. कैसे बर्फ़ की सिल्लियां कहा करता था इन उंगलियों को. आंखे भर आती है, आंचल माथे से और नीचे सरक आता है। हाथ ख़ुद ब ख़ुद खाली मटकी की ओर. जैसे किसी धुन में हो, पैर खुद रास्तो को जानते है. ये बृन्दावन की सड़क नहीं पर फर्क होता है क्या? सब एक ही होते हैं न? बस चलने वाले बदल जाते हैं. कब और कैसे राधा घाट तक जात...
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कौन मिट्टी गढ़ी मोरी मूरत हो श्याम बस सुगढ़ सलोनी, मोरी सूरत हो श्याम कैसे बांधे तूने बिखरे बिखरे से मोरे मन नैनो से दिन रात अब तो, झरत हो श्याम न जानूं मैं दिन, न जानू मैं रात रहूँ बेचैन, हर घडी सोचूँ बस तोरी बात भये कैसे निर्मोही तुम,रंग मोहे श्याम रंग कारे रंग और कारे, मनवा भी तोरे श्याम न खोज खबर पूछी, न ही ध्यान ही धरो जाओ, अब न तुमसे बोलूंगी, चाहे पैयाँ पड़ो ऐसे बैरी सजन से , मैं अकेली भली भले तोसे, बिरह के मोरे रैन, हो श्याम कहा करते तो थे तुम, मोसे प्यारी न कोई कैसे मथुरा की मिट्टी, अब निगोड़ी है भाई ? सुनते हो, तो सुन लो , बस इतनी दुहाई अब न आये, तो जमुना की गोदी में राधे सोई