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इंतेज़ार

इंतेज़ार परिवर्तन का इंसान क्यू ना करे, जब प्रकृति भी करती है क्यू ज़ोर ज़बरदस्ती? लाओ परिवर्तन, करो बदलाव, अब नही तो कब क्या सूरज नही बाट जोहता है रात के ढल जाने की बूँद से भरे बादल, क्या तब तक नही रुके रहते जबतक ना मिले वो पर्वत, टकरा कर बिखर जाने को नदियाँ क्या बिन बात ही रास्ते मोड़ लेती हैं? या मंद मंद ही बहती है तबतक जबतक, वो बूंदे भर देती है दामन और तोड़ जाती हैं सारे बाँध बर्फ़ीले बादल रुके रहते हैं टकटकी लगाए, इस धरती पे तबतक जबतक, छू नही लेता तापमान शून्य को और मखमली बर्फ, सिहरकर गिरती है फिर क्या पल, और क्या युग क्या सदीया , क्या नयी रुत? इंतेज़ार ही हासिल है और वही तकदीर इंसानो को हो या नियम कुदरत
हर रूप मे , हर वेश मे हो आदि मे या शेष मे अपने हृदय मे रुधिर मे पलायन मे या स्थिर मे रंग मे, बेरंग मे तुम बिने, हुए बदरंग मे इस अंग मे, उस अंग मे मरती हुई, हर उमंग मे वो बाँसुरी मे कृष्ण के वो शिव के लिपटी भस्म के अरमानो की इस राख मे या हो उम्मीदो की साख मे खिलती है गर कोई कली तेरी गली, बस तेरी गली
बडी मुद्दत से यकि प्यार के वजूद होने पर आया जरा जरा सी बात मे नाहक हि ना झुठ्लाओ तुम बडा खुद्गर्ज़ ये मिज़ाम मेरा, अब हो चला है लो ये पलके झुकायी , सामने आ जाओ तुम
सुलगते जज़्बातो को हमे हवा और नही देनी है चलो जाओ भी तुमसे अब कोइ, बात नही करनी है कोरा सा भोला भाला ये खाली पन्ने सा मन था रन्ग अन्गिनत भरदिये , मुझे ्कर दिया भ्रमित सा हर एक नये अल्फ़ाज़ से, अन्दाज से , उलझति मै जाती हू अब एक लकीर नयी मुझे , इसपर नही खिचनी है चलो जाओ भी तुमसे अब कोइ, बात नही करनी है बहुत बार टाला, फ़ुसलाया दफ़ा लाखो पर बेलगाम मन की, हिमाकत तो देखो यु छुप छुप के तकिये भिगोने, ठन्ढि आह नही भरनी है चलो जाओ भी तुमसे अब कोइ, बात नही करनी है

मरीचिका - इन्द्रधनुष

कस कर मुठ्टी, बाँध कर कमर भागे सारे, संग संग हम नही जानते थे नादान सब दौड़ रहे हैं मरीचिका कि तरफ़ हाफते हफ्ते गिरते पड़ते कभी सम्हलते कभी फिसलते रुकते चलते धक्के मारते बेतहाशा, पहुचेतो मिली हताशा आँसू ढलेक , खोली मुठ्टी खोली मुठ्टी, तब भौचक्के सबने देखा इन्द्रधनुष मुठ्टी में बंद था बिखरे रंग, और निखरा जीवन खिलि रोशनी, बरसे सावन
शिकायत है ये उनको, कि हमने गैर बना रखा है पूछते है हम उनसे , जवाब दे जो हो उनको गवारा गैर होके अगर दिल का मेरे, ये हाल बना रखा है खुदा कसम जो अपने होते, ना जाने क्या होता
कदमो कि आहट अब भी आती है कहा से तेरी बात तो तय हुयी थी, रास्तों को बदलने कि खिडकियां मेरे घर कि, बंद है दरवाजे सारे फिर भी क्यू तेरी रोशनी झाकति है रोशंदानो से अरसो से मकड जाल ने, घेर रखा था जिसको लगता है जला जाओगे तुम उसे, अपने नूर से आँखें भिच के बैठे है, ना देखेंगे कभी तुमको पर खुशबुओं से तेरे फिर क्यू, मेहेका मेरा दामन है
आज तो जरुर बात कुछ और है क्यू गूँजता जेहन में खामोशी का शोर है? है इश्क नही ये, दफा लाख कहा दिल को मुआ अब भी नही सुनता, धड़कता तेरी ओर है
यु ही पीछॆ पीछॆ तेरे चलते आये पार करते अन गिनत गलियाँ कितने ही चौबारे बड़ी दूर आकर जो नजरें घुमाइ तो सब्कुछ था अंजाना बिन एक तेरे, निशान कदमो के अब क्या सोचूँ, और करूँ भी तो क्या चलने लगी फिर से तेरे पिछे मैं नज़रे झुकाये
तस्वीर सी बनकर दिल मे जो उतर जाये खुश्बु सी जो भट्के बिन कहे मह्का जाये सासो सी बस बिन कहे आये और जाये जो हो तो बस हो, न हो तो कम्ब्ख्त जान निकल जाये ये इश्क है तुम्हारा ये जिन्दगी हमारी अब इससे आगे बोलो जाये तो कहा जाये