पापा क्या धूमिल हो जाएँगी स्मृतिया यु कभी कभार बस मिलने से क्या मर जायेगा धीरे धीरे स्नेह न बाते करने से क्या नहीं बचेगा प्रेम न कोई दिलपर अब दस्तक होगी मरने से पहले ही क्या अपने कांधे अपनी अर्थी होगी ? हो जायेगा विकलाँग ह्रदय हाथ पाँव कटने जैसा क्या नहीं बहेंगे अश्रुधार घावों सा रिसता, रिश्ता कैसा? क्या ऐसा भी होगा अनर्थ होंगे भूत प्रेत से बदतर हम हे प्रभो दया कर हर लेना तब प्राण भी अपने तुम
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कोलकाता - मेरी जन्मभूमि. कभी भी मेरे पास पर्याप्त शब्द नहीं होंगे यह व्यक्त करने को, की क्या क्या मिला है मुझे बस वहां जन्म लेकर. कितने गौरव और कितने आह्लाद से आज भी वहां की हवा के स्मरण मात्र से जैसे जीने की अभिलाषा पुनः जीवित हो जाती है. हाँ, उसी धूल कोलाहल और पसीने में सनी हवा. भाषा यु तो मैंने वहां की सीखी ज़रूर पर निभाई हिंदी के साथ, पर जहाँ बात भावनाओ की आती है और अपने घर की वो तो बस एक ही है. साक्षात् भगवती का घर, दखिनेश्वेर का ईंट वाला लाल आंगन और मटमैली गंगा की निरंतर बहती तटस्थता. अपना तो बस वही घर है... जो है. इस हाड मांस के शरीर में जो आत्मा अविचल धधकती है वो शायद वही रचने बसने को तरसती है. जो भी अध्याय आजतक लिखे, उस लेखनी में स्याही इन्ही अनुभवों का है जो मुझे वहां की हवा मिटटी ने दिए. वही ढोये बाँटते और सुनते चलती हूँ.... मांझी रे
Scars
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Scars Scars that you see Scars the you don’t Scars you can find And those that you wont Scars, silently bleed Scars, those scream Scars left for all long-forgotten dreams Scars, that you stare at Scars, that you admire Many, are a reminder of those unfulfilled desires Scars you may think Are a piece of an art Leaving an enviable pattern mosaic, of the broken heart Dead, Long ago No, it doesn’t hurt anymore If you have any darts? Practice, Practice, some more