धरती से बंधकर अब बोर हो चुके हैं जी करता है कुछ दिन, सूरज से बन्ध जाये यु घूम घूम चक्कर ने दूर कर दिया है शायद किरणों पे सवार हो, रोज़ तुमको छु पाये
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आजकल कुछ तो बदले हैं मौसम कही क्यों गुनगुनाता सा हर पल रहता है मन कोई मुस्कराहट खींची रहती है लब पर होश खोया सा है, कोई अपनी ही धुन ढूंढती रहती हैं आँखे और मेरी अंगुलियां टटोलती है , हवा में , तुम्हारे निशान खुश्बुओ को खोजती है, बंद करके आँखे आजकल बोलती भी हूँ मैं, तुम्हारी ज़ुबान कौन कहता है, समय भर देता है सारे घाव किस सरहद की बात जाने करते हैं लोग कितनी बच के चली, सम्हाला दामन सदा फिर भी लग के रहा ,जाने कैसे तेरा ये रोग सीमा नहीं वक़्त की अब कोई न ही रही गांठ जिसको सुलझाते हम अंतहीन और अनंत ये तुमसे रिश्ता मेरा साँसों के संग बहे जाते से हम
कौन हूँ कौन हूँ कौन हूँ मैं आखिर
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नाम मेरा कुछ भी किसी ने रख दिया था चेहरा भी मेरा , अपना कभी भी नहीं था कहते हैं दिमाग की वायरिंग भी उधार की है जो भी दीखता है सबको, पहचान तो नहीं है अब सोचती हूँ लगता है , कौन जानता मुझे है जब खुद नहीं पता, तो उम्मीद भी किसे है क्या भावनाए मन की? मेरी अपनी सगी है? या जो शब्द बोलती हूँ, असल में बस मेरी है? सब कुछ यहाँ वहां से, छिना है या चुराया पर दिल ने जो तुम्हारे, बस मुझे अपनाया वो एक भावना ही है जो, असली है, है बस हमारी बाकि के सब भुलावे, है या थोपे या बनावटी
Papa
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आँखों में कहाँ नींद, जब लगी हो आग मन को पैरो में क्या थकन ,जब चले हो अपने घर को क्या मान क्या सम्मान, जब हो लुटती जान दूरी तो महज एक संख्या , जब जुड़े हो प्राण दिखता कहाँ गलत सही, कब वक़्त सोचने का जब बात तुम्हारी है, मर्यादाओ को ताक रखा न रखे उम्मीद कोई, की भूल हो गयी थी भावनाओ में बहकर, थोड़ी बावली सी मैं थी इस बार जो किया है, हर बार वो करुँगी तुम्हारे लिए तो ढाल बन, तलवार से लड़ूंगी
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जो बस में होता बनाके तुमको अंगूठी, उंगलियो में पहनती बंद करती मुठ्ठी में तन्हाईयो में चूमती बनाके झुमके तुम्हारे, डालती कानो में बेवजह सर हिलाकर गालो को चूमते तुम सजाके हथेलियों की मेहंदी में रखती नज़रो के आगे बसाती सांसो में वो महक मैं हमेशा बनाकर चाभी के गुंचे डाल लेती कमर में हर चाल हर कदम पे मेरे संग तुम भी थिरकते अनगिनत है तरीके संग तुम्हे बाँधने के फिर क्या दुनिया के रिश्ते और क्या हाथ की लकीरे
इंतेज़ार
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इंतेज़ार परिवर्तन का इंसान क्यू ना करे, जब प्रकृति भी करती है क्यू ज़ोर ज़बरदस्ती? लाओ परिवर्तन, करो बदलाव, अब नही तो कब क्या सूरज नही बाट जोहता है रात के ढल जाने की बूँद से भरे बादल, क्या तब तक नही रुके रहते जबतक ना मिले वो पर्वत, टकरा कर बिखर जाने को नदियाँ क्या बिन बात ही रास्ते मोड़ लेती हैं? या मंद मंद ही बहती है तबतक जबतक, वो बूंदे भर देती है दामन और तोड़ जाती हैं सारे बाँध बर्फ़ीले बादल रुके रहते हैं टकटकी लगाए, इस धरती पे तबतक जबतक, छू नही लेता तापमान शून्य को और मखमली बर्फ, सिहरकर गिरती है फिर क्या पल, और क्या युग क्या सदीया , क्या नयी रुत? इंतेज़ार ही हासिल है और वही तकदीर इंसानो को हो या नियम कुदरत
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सुलगते जज़्बातो को हमे हवा और नही देनी है चलो जाओ भी तुमसे अब कोइ, बात नही करनी है कोरा सा भोला भाला ये खाली पन्ने सा मन था रन्ग अन्गिनत भरदिये , मुझे ्कर दिया भ्रमित सा हर एक नये अल्फ़ाज़ से, अन्दाज से , उलझति मै जाती हू अब एक लकीर नयी मुझे , इसपर नही खिचनी है चलो जाओ भी तुमसे अब कोइ, बात नही करनी है बहुत बार टाला, फ़ुसलाया दफ़ा लाखो पर बेलगाम मन की, हिमाकत तो देखो यु छुप छुप के तकिये भिगोने, ठन्ढि आह नही भरनी है चलो जाओ भी तुमसे अब कोइ, बात नही करनी है