मैं मीरा.
मैं मीरा. इक्कीसवी सदी की. मैं भी महलों में रही हूँ , किसी की रानी? शायद...कहलाती भी हूँ. कौन जाने कबतक? आखिरकार नयी सदी है, नया ज़माना है. और कहानी में अंत में तो मीरा रानी...दीवानी कहाने ही लगी. विश? आजकल से नहीं, कठोर होकर पिलाया जा रहा है... अर्सो तक. वो भी ऐसा विश की धीरे धीरे की एक दिन मीरा खुद ही मान लेती है की अब वो मुर्दा ही तो है. सारे एहसासों का तिल तिल मर जाना , एक एक कर अपनी आवाज़ को खो देना। ...एक विषपान में नहीं होता। . छोटे छोटे कई डोज़ेस से होता है जनाब. खैर, ये तो हुआ एक पहलू। अब कहानी ये है की फिर मीरा मीरा कैसे होती है? क्युकी कहानी में तो उसका बचना भी लाजमी है. और उसके लिए होना होगा कही कोई कृष्ण. अब मुद्दा ये नहीं की कृष्ण कौन है, कब आएंगे , कैसे मीरा उनकी दीवानी हो जाएँगी बल्कि पते की बात ये है मीरा को कब एहसास होगा की कृष्ण है और वही उसकी नियति भी है. उसको पाने में नहीं, बल्कि उसे चाहने में ही उसके निर्वाह और निर्वाण दोनों सन्निहित है. तो इस मीरा की कहानी में एक मोड़ आता है, जब इसका दिमाग आखिर उसके शरीर का साथ छोड़ने पर मजबूर हो उठता है. महल में कि...