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Showing posts from August, 2019

मैं मीरा.

मैं मीरा. इक्कीसवी सदी की. मैं भी महलों में रही हूँ , किसी की रानी? शायद...कहलाती भी हूँ. कौन जाने कबतक? आखिरकार नयी सदी है, नया ज़माना है. और कहानी में अंत में तो मीरा रानी...दीवानी कहाने ही लगी. विश? आजकल से नहीं, कठोर होकर पिलाया जा रहा है... अर्सो तक. वो भी ऐसा विश की धीरे धीरे की एक दिन मीरा खुद ही मान लेती है की अब वो मुर्दा ही तो है. सारे एहसासों का तिल तिल मर जाना , एक एक कर अपनी आवाज़ को खो देना। ...एक विषपान में नहीं होता। . छोटे छोटे कई डोज़ेस से होता है जनाब. खैर, ये तो हुआ एक पहलू।  अब कहानी ये है की फिर मीरा मीरा कैसे होती है? क्युकी कहानी में तो उसका बचना भी लाजमी है. और उसके लिए होना होगा कही कोई कृष्ण. अब मुद्दा ये नहीं की कृष्ण कौन है, कब आएंगे , कैसे मीरा उनकी दीवानी हो जाएँगी बल्कि पते की बात ये है मीरा को कब एहसास होगा की कृष्ण है और वही उसकी नियति भी है. उसको पाने में नहीं, बल्कि उसे चाहने में ही उसके निर्वाह और निर्वाण दोनों सन्निहित है. तो इस मीरा की कहानी में एक मोड़ आता है, जब इसका दिमाग आखिर उसके शरीर का साथ छोड़ने पर मजबूर हो उठता है. महल में कि...
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One dance Honey Just One more dance One last dance Before a dance That lasts forever and ever Here in your arms Swept off my feet Here in my eyes Dreams your, I keep With you, I swing Weak in my knees Words , whispers, song The silence, speak Just this dance This little romance When the blue birds sing  the moon melts down And the clouds rain Thunders clapping around You me and you Me you and me Who will know who is Me in you or you in me Just one dance one more last dance  
धरा आँख मूँद  कर पसरी हुयी है बस यु ही।   किसी गहन चिंतन में शायद . तारे टिमटिमा रहे हैं जैसे कोई भी और रात में टिमटिमाया करते हैं. बस चाँद नदारत है. इन बातो से कुछ फर्क नहीं पड़ता उसको. उसकी पीठ, अभी अभी हुयी बारिश में  भीगी हुयी घास से सिंच  रही है और पांव की उंगलिया जैसे ठंढी में बर्फ  की सिल्लियो से जमे जा रहे हैं. फिर भी कुछ फर्क नहीं पड़ता।  वो तो आंखे मूंदे बस मुस्कराये जा रही है.  क्या जाने कौन सी दुनिया में रहती है ये? व्योम आस पास कहीं भी नहीं , कैसे हो ? रात है , चाँद भी नहीं।  ऐसे में कुछ दिखता है भला? बस झींगुरो की आवाजें  जुगनुओं की चहल पहल है की पता चलता है की यही है वो मायावी सी दुनिया.  व्योम कही अनंत सा खामोश विलीन  होगा,किसी  अंतहीन में।  कौन जाने?  अरी ओ , दीवानी। कुछ पता भी है तुम्हे की कहाँ हो और क्यों हो? कौन लेकर आया तुम्हे यहाँ और ऐसे छोड़ गया ? खिलखिला कर हंस पड़ती है धरा. और उसके हॅसते ही जैसे रात रानी की एक एक कली खिल उठती  है इस वीरानी रात में. और महक उठता है इस बाग़ का कोना...
गिले तुमसे नहीं थे कभी  न ही खुद से शिक़वा  किस्मतो का ही कुछ ऐसा  न था मिलना लिखा   लगा था एक पल को  की बस अब सांस ले सकेंगे  जितनी बातें बंद थी हलक़ में  तुमको खुल के कह सकेंगे   लेकिन,कहके भी सबकुछ  अबकुछ कहने से डरते हैं  पूछता है दिल हर पल   क्या हम अभी भी धड़कते हैं ?  आंखे ढूँढा करती है निशां  पाँव के तुम्हारे  हर झोंका देता है भ्रम  तुम क्या पास हो हमारे ?
लहरें आएंगी  और फिर बहा ले जाएँगी  लेकिन इस डर से क्या  हम रेत के अपने महल  फिर से बनाना छोड़ दे? नींद खुल जाएगी तो क्या  सपने सजाना छोड़ दे? 

मुझे आप किसलिए मिल गए ?

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व्योम - "....रूह में फ़ासले  नहीं होते,क़ाश हम तुम मिले नहीं होते" धरा - "लेकिन अब तो मिल  गए? अब तो ये भी पता लग गया की फ़ासले बस उतने हैं  जो या तो इंची टेप से मापे जा सकते है या फिर ये कहकर की ये ज़माने की किसी  क़ायदे वाली रिश्तों सांचे में फिट नहीं हो रहा.  क्यों? इतना ही ना ? " व्योम - "तुम न...बड़ी जिद्दी , बड़ी मुश्किल !" धरा - "वो तो हूँ. अब क्या करे? " व्योम - ".... कतरा कतरा मिलती है , कतरा कतरा जीने दो.. " धरा - "वो तो सब जीते  हैं, हम भी तुम भी..इसमें नया क्या है?" व्योम -  "अरे हैं ना , तुम्हे पता भी  है  की ये गाना कैसे रिकॉर्ड हुआ है?  कमाल की आवाज़ तो है ही आशा भोसले की पर  दो ट्रैक पर गाना रिकॉर्ड करके एक मुकाम बनाया है बर्मन दा ने..." धरा - "अच्छा,सुनने दो.. एकबार फिर" .. (गुलज़ार के बोल. उफ़)  व्योम - " चलो, कुछ ढंग के गाने ही सुन लिया करो मेरी संगत में. " अहा , जैसे मुझे पता ही नहीं था...... (कल भी ऐसा ही कुछ हुआ था.... सपने पे पाओं पड़ गया था ) व्योम - ...
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बादलों की तो फ़ितरत हमेशा उड़ जाने की ही है ऐ बारिश तू भी अब क्या इसके इश्क़ में सबको दग़ा देगी?

Love simply

It hovers And drifts And it floats Lingering Forever Secretly Drawn into oblivion  Blindly Until  It happens And it collides Creating Fire  Dust Clouds of destruction  On Everyone  On everything And then  It flusters It always does That’s how nature works Dust settles  And eventually When it rains They grow too  It grows  Fragrant 
कहने को सावन बादल नहीं कोई बस वही दो बरसी जो अँखियाँ न सोई न बदले ये मौसम बस आये रुत जाए मुई मन का कलेश ये ठहरी काली घटाएं जाने कितने जतन से जो थी जन्मो पिरोयी टूटी माला के मोती अब मैं चुन चुन के हारी न पूछो मुझसे बतिया जानू तेरी ठिठोली तू वो न हो सका मेरा जो मैं पल भर में हो ली
आसमान   का   रंग   नीले   से   गुलाबी   होता   है ,  और   फिर   गहरा और   गहरा . सूरज   धीमे   धीमे   डूब   चुका   है   रात   की   गोद   में   चाँद   फ़लक   पर   ऐसे   चमक  रहा   है   जैसे   सारा   आस्मां   अब   उसका   अपना   है .  बेचारे   तारे   अभी   तक टिमटिमाने   की   भी   हिम्मत   नहीं   कर    रहे , बस   एक   कोई   है   चाँद   के   पास   जो  ढीठ   सा   रोशन   हुए   जा   रहा   है . हवाएं   भी   बड़ी   अच्छी   चलती   है   शाम   की   ऐसी   बेला   में  ,  ख़ास   कर   गंगा   के  किनारे .  धरा   की   आँखों   में   जैसे   आसमान   का   सारा   रंग   हूबहू   उतर...
হয় বিকেল দেখো, ভীষণ অন্ধকার হাথ ধরে , একটু বসি আজ এই মেঘলা আকাশ চোখে রেখে চলো  ঘুমিয়ে পড়ি যদি বৃষ্টি হয় কান পেতে সঙ্গে তোমার, শুনি 
निगाहें ख़ंजर ज़बान बरछी तेरी ज़ालिम क़सम से क्यों जागते हो फिर भी रातें जब हैं लूटी सारी निंदे तुमने अपने सनम से? 
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लेहेरो में यही कही खोकर एक बार फिर मिलेंगे कश्तियाँ कही डुबोकर एकबार फिर मिलेंगे बारिशो में तेरे जी भर फिर एक बार तो भीगेंगे जी जी के तेरे इश्क़ में जी भर के अब मरेंगे आ भी जा तू आ भी जा के कब तक तेरी बाट तकेंगे तेरी बाट तकेंगे
घुट घुट जी रही थी  घुट घुट के मर रही थी  करने को तुझ से दिल की बात  शायद मैं अब तक यहाँ खड़ी थी 
तुम जो सो रहे है तो तुमको निहारू जी तो करता है नींद में तुमको पुकारू बताओ न , नाराज हो तो न जाओगे वादा करो न आज भी तुम  सपनो में आओगे ? निभाओ न सही लेकिन होतो तसल्ली खयालो में मेरे रहो न यु ही तुम क्यों बाँधी है तुमसे ये मन की डोरी खींचे क्यों मन को मेरे जो ऊंघते हो तुम? 
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कहाँ जा रहे हो? जरा तुम बताओ ये लहरों में बहते, क्या किरणों के पीछे? क्या तुमको पता है , कहाँ है किनारे ? क्या तुम जानते हो, प्रकृति के इशारे? बड़े मस्तमौला मगन  तुम हो दिखते है पानीयो से ,  कुछ गहरे से रिश्ते? बड़ा मनचला सा,  मेरा भी मन है चलो संग अपने,  मुझे भी ले जाओ?
इन पर्वतों के दायरों में  खुली वादियों की बाहों में  शुकुन से रह लेने दो  जी भर के रो लेने दो  तरसने दो दिल की आहों को  बरसने दो अब निगाहों को  रूठ , टूट , छूट जाने दो  इन बेगानी सी पनाहों को  लबो पे मुस्कराहट हो  पर आँखों में ठहरी सी नमी  भर जाए तमाम जन्नते यहाँ  दिल में हो ज़रा सी फिर भी कमी  खुद से गैर, हो के  लगे गैर के गले चलो  सच था, या सपना  किसको पता? तुम्ही बोलो 
माना की सफर नहीं आसान  और मुश्किलें हैं राहों  में  पर अभी अँधेरा इतना भी नहीं  की वापस लौट जाएँ हम  कहाँ बस में कभी हालात  कहाँ बस में कभी जज्बात  अभी उम्मीद जिन्दा है  अभी ढलने को बाकी रात  न रूठो तुम की  मनाने की इज़ाज़त तक न हमको है  न छीनो ये शुकुन  की नाहक अब मुहब्बत है