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 मुझे माफ़ ही कीजिये  क्युकी  इधर मुहब्बत हुयी  और उधर दिल टूटा  जो डरते रहे हम  डराते रहे वो  हारते रहे हम  हराते रहे वो  न पिघलता आग में  तो सोना निखरता कैसे? न चोट पड़ती अनगिनत  तो हीरा दमकता कैसे  न उम्र भर को टंगता  यूं ही कहीं आस्मां में  तो अँधेरी रात में रोशन  भला चाँद, चमकता कैसे  तुमने ही छूकर अब अनछुआ किया है  तो अब देखकर भी अनदेखा करेंगे  हर बात में भी जब कई सी बाते हो  होकर भी न हुयी जो मुलाकाते हो  भींगी हैं इश्क़ में मेरी गीली साँसे भी  हर सलवटों में अब तेरी ही रातें हो  अब हथेली भर को मुझे चाहत दे दो  उम्र भर   मुझे जाने की इज़ाज़त दे दो  मुहब्बत उनसे न हुयी  खुद से हो गयी  जिस्म कहीं भी जले, मुलाकात  रूह से हो गयी  किस तरह अब वो झुठलाए  हमारा सुलगना उनके सीने में  अब तो कायनात सांस लेती है  बस हमारे इश्क़ के होने में  यूँ उलझाकर के बातों में कहो कहा ले जाने का इरादा है  बस अब लौट कर न जाओ   क्या दि...

January 2022

 रहने दो कायदों की कैद  अब तुम ज़माने के लिए  लो पलके झुका ली तेरी आँखों में समाने के लिए  
ये है इंतज़ार की किस्मत  नहाकर इश्क़ में हम तुम  न ही डूबे , न ही उतरे  न लग पाए पार अब हम तुम  यु ही सुलगो ,मगर न जलो  नहीं  बुझने वाली ये कभी  हवाएं साँसों की जबतक  रहेगी आंच , ये हम तुम  नहीं इन लब्ज़ो की मंजिल है न ही वो दिल को हासिल है  इधर चुभती हुयी सी आस  उधर एक यार, गाफिल है  है अगर इश्क़ तो मेरे बाद  एक ईमारत लब्जों की मेरे  बनाकर, सफ़ेद सी मेरे यार  कभी, सजदे कर लिया करना  - ताजमहल  न तब थी मेरे बस में  न अभी है , हाय मेरा ये दिल  हैं जब तन्हाईयों की मंजिल  यही आकर, तू मुझसे मिल  जब हम किसी को खोने के डर से सच नहीं बोल पाते  हम तो स्वतः उसे खो चुके होते है, बस मान नहीं पाते.  वही जलता है सीने में  वही दिल का शुकुन भी है  जहा ठहर जाते है जाकर  कम्बख्त, वही मेरा जुनूँ भी है  क्या तुम्ही थे कृष्ण की मूरत  क्या सांवली सी थी वो सूरत  धुनकी में बस लिखी जा रही हूँ  कब हो, कब हो दर्शन की महूरत न जो बोलोगे तो भी हम बोलेंगे  न जो देख...
 कितनी भी हो काली रात  सुबह आती ही है  जहाँ होती है दिलों की बात  सुलझ जाती ही है  मिला दिल को शुकूं और लबो को जो हंसी  तो कर गए फिर एक गुस्ताख़ी हम  पर क्यों दिल बस कह रहा है शुक्रिया  क्यों पड़ गयी हज़्ज़ार माफ़ी कम है मेरी , जैसी भी है  तू जिंदगी कमसिन  ए रूह, तुमसे भी मिलेंगे  कमब्खत एक दिन कमब्खत उस दिन न होगी रात और न दिन  एक लम्बी शाम होगी  आसमा चाँद बिन  फंसाकर इन उंगलियों में उंगलिया  हेना से रंग दू हथेली, मैं तुम्हारी भी  लिख जायें दास्ताने इश्क़ आज  लब्ज़, कुछ तुम्हारे और कहानी कुछ हमारी भी  तुम्हारा दिल धड़कता है  हमारा नाम उसमे क्यों?  तेरा गुलशन महकता है  हमारा काम उसमे क्यों?  है चिलचिलाती दोपहर  झुलसते जिस्म हालात में  शुकूं का एक लम्हा, बस   हमारी शाम उसमे क्यों?  न कहनी है न करनी है न सुननी है  बस  ठहर जाओ  हां, मनमानी. 
 जब दूर थे  अनजान थे  तो खास थे  गुमनाम से  पास आते ही  कुछ पाते ही  थे दरम्यां  एहसास से  पर अब नहीं  खोये कही  वो आरज़ू  चुपचाप से   तय तो कर लेंगे सफर , हम तनहा भी मगर  ए जिंदगी तू साथ होती, फिर बात ही क्या थी  जो रोशन इन दिलो की आग से होती  हो कितनी भी अँधेरी ,फिर वो रात ही क्या थी  नज़रअंदाज कहकर बस हमी को ही ,तुम पिया देखो ना  तुम्हारे नाम से हमको अभी तक है देखती दुनिया देखो ना  तुम्हारे नूर से ही तो है रोशन, जहाँ मेरी उम्मीदो की   आये हो बनकर बारिशों से, तो जी भर भीगते हैं आज  देखो ना   अभी मैं जरा जरा सी टुकड़ो में बंटी हूँ  एक हिस्सा अतीत में और कल में भी हूँ  गुजर कर ठहर गया, फिर कहीं गया ही नहीं उस पिघले से और जमे हुए , पल में भी हूँ 
 हर सुना अब  अनसुना कर  अड़ गयी  बस लड़ गयी मैं  दीवार थी  और चोट खाकर  कील जैसी  हूँ गड़ गयी मैं  न हिलूंगी न मुड़ुँगी  हर दर्द से  आगे बढ़ गयी मैं  अनदेखा कर सब देखते हैं  चुपचाप से अब  हर ईमारत चढ़ गयी मैं  उफ़ क़यामत कर गयी मैं  हाय क़यामत कर गयी मैं 

प्रेम - तलाश ख़त्म

 "गोरे बदन पे, उंगली से मेरा , नाम अदा लिखना " - गुलज़ार  किसने लिखा , किसने पढ़ा और किसने समझा? अब कौन माथापच्ची करे इसमें। हम तो बस श्रेया घोषाल के अंदाज पर कुर्बान हो लिए और यकीं भी कर लिया की "रातें बुझाने तुम आ गए हो".  प्रेम - तलाश ख़त्म .  आज बड़े दिन बाद, इस कड़ी में एक और जोड़ देने का मन हो चला है.  क्यों? ऐसी कोई वजह नहीं है मेरे पास आज देने को. और आपको भी, आम खाने से मतलब होना चाहिए न की पेड़ गिनने से. पिछले साल की मई के बाद , नहीं लिख पायी थी कोई और कड़ी. जैसे जंजीरो से ही रिश्ता तोड़ लिया हो मैंने. लेकिन अब ऐसा लगता है, मेरे अनदेखे कर भी देने से ये जंजीरे मुझे अकेला नहीं छोड़ेंगी.  और फिर ये ख्याल आया की इंसान जंजीरो में पड़े रहने को ही तो कही प्रेम नहीं कहता हैं?  न, जंजीर खुद प्रेम नहीं होता पर हमारी तीब्र आकांक्षा किसी न किसी जंजीर में बंधे रहने की और बाँध लेने की, कई बार प्रेम कहलायी चली जाती है.  हाँ, अब ये भी सच है की बिना प्रेम किसी को बाँध लेना, या बंध जाना संभव भी नहीं. लेकिन बस बंधे रहना भी तो प्रेम का हासिल नहीं। प्रेम, प्रतिष्ठा और प...
 जन्म  मेरा हुआ था  सिर्फ मेरे परिवार की लक्ष्मी बिटिया का नहीं  अरमान   कुछ मेरे भी थे  मेरे पूर्वजों के अधूरे वालों के अलावा भी  ह्रदय   मेरा अपना भी था  सिर्फ मंडप पर मेरे साथ खड़े पुरुष का ही नहीं  मर्यादा  मेरी भी थी  सिर्फ यदा कदा जुड़ते गए रिश्तों के ही नहीं  लेकिन दायित्व सपनों को स्वाहा करने ही   मर्यादाओं के उल्लंघनों की ह्रदय के छलनी हो टूटने की  और अरमान?  उन्हें मृतक घोषित करने की  सिर्फ मेरी अकेले की  सिर्फ और सिर्फ मेरी अपनी 

बिरयानी

 "कोशिश. हर कोई अपनी तरफ से पूरी ही करता है. मैंने की थी तो तुमने भी की ही होगी, अब न बनी तो न सही. " "क्या?" "बिरयानी, और क्या. " "क्या बात करती हो? बिरयानी न बनी तुमसे? कब से तो हांड़ी टांग रखी है तुमने. और वो जो खुशबु पुरे मोहल्ले में थी? सो क्या था भला. " "अरे बहन. खुश्बुओ का क्या है, आजकल बाजार में न हम फ्लेवर की अगरबत्ती मोमबत्ती या एयर फ्रेशनर मिल जाता है. तो बस. कभी मैं, कभी मेरे वो , वही छिड़क दिया करते थे. जब जब लोग गुज़रते थे. लेकिन बिरयानी तो कभी न बन सकी हम से. " " हमारे घर तो हर रोज़ बनती है. " थोड़ा ऐंठते हुये बोली पल्लो।  "अच्छा है बहन, अब शौख तो मुझे भी बहुत था. लेकिन क्या करे , सबके भाग तुम्हारे जैसे कहाँ होते है ".  "हाँ हाँ सो तो है, चलो कोई बात नहीं। अब तक जैसे मोमबत्ती , एयर फ्रेशनर से काम चलाया है , चला लो."  "न , मैंने तो हांड़ी ही फेंक दी".  ऐसा लगा जैसे पल्लो के सर पर ही फोड़ दिया हो।  "क्या बक रही हो? हांड़ी ही फोड़ दी, ऐसा अनर्थ कैसे कर दिया? चलो दिखाओ कहाँ हैं टुकड़े, सब जो...