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बस हाथ थमने से

मेहँदी से लिखी मैंने और आंसुओं से मिटाई कहानी मुहब्बत की दास्ताँ सपनो की धुलकर जो सामने आई मेरे हाथ की लकीरे टेढ़ी मेढ़ी और उलझी उलझी भाषा जिसकी न मैंने समझी ना की कभी तुमने कोशिश बस बंद करके मुट्ठी चलते रहे हम, इतना न समझे की जुडती हैं लकीरे बस हाथ थमने से
बस दो बात समझ में आई है और लगता है अब कुछ समझने को बाकी नहीं है की गुज़र जाता है समय, जिसके पीछे हम भागते है और रह जाती हैं बस यादे जिन्हें हम पूछते तक नहीं मायूसियो के लम्हों में और जब हो तन्हाईयाँ समय तो स्वार्थी बनकर बस यु ही चलता रहता है यादे पुरानी , भली या बुरी हो देती है ठंडक, बनकर पुरवाईयाँ तो बस आज से मुझको नहीं भागना है बेकार ही नहीं करनी कोशिश, बंधने की समय को बस बुनने हैं ताने-बाने में ऐसी यादो को जो रहे हर पल इस दिल के करीब, अपने बनकर

छोटी सी चींटी

छोटी सी चींटी , छोटी सी चींटी चढ़ती उतरती और गिरती पड़ती लेकर उम्मीदे और बोझ दुनिया भर के की कर लुंगी सबकुछ, जाउंगी पहुँच मंजिल दूर सही, पर मैं मायुश नहीं छोटी सी चींटी ,छोटी सी चींटी उडती गुजर जाती है एक तितली देखती है निचे, रेंगती सी चींटी करती है अनदेखा उसकी अनथक कोशिस पल भर को चींटी भी सोचती है की काश मैं भी उड़ाती लेकिन नहीं भूलती वो फिर भी चढ़ते रहेना न ही छोडती है पीछे , वो बोझ पीठ के कितने बड़े काम करती है आखिर कौन कह सकता है भला उससे? छोटी सी चींटी छोटी सी चींटी !
कैसे ख़तम होती है कहानी बस इतना जो पता होता तो फिर देखते तुम और जानती दुनिया मुझको और मेरी लेखनी को लेकिन क्या करूँ, की मुझे बस पता है की कैसे होती है शुरू , पर अंत विहीन कैसे लिखू जब नहीं जानती कैसे होगी ख़तम क्या तुम्हे पता है?
पहनकर प्यार कलाई में, सजाकर प्यार माथे पर बदलकर हार गलो के विदा तुमने किया बहाकर गंगा आँखों से, रखकर ह्रदय पर हिमालय मुरझाया सा लेकर कमल-सा मन विदा तुमने किया खोलकर मन की सारी गाँठ, मिटाकर भ्रान्ति के एहसास बांधकर गठारी भर विश्वाश विदा तुमने किया पाने को ये सौगात, मिटाने दुनियाभर की थकान चखने प्रेम के असली स्वाद मैं वापस आऊंगी
बड़ा ही मायूस आज ये मन है, हफ्ते भर से सोच मगन है आखिर भूल हुयी है कौन सी, खुद पर अब संदेह हुआ है सच तो है मासूम नहीं मैं, कभी स्वार्थ से कभी मोह से कौन बचा है? बची नहीं मैं लेकिन इतना भी मानो सच है, जिसको गले लगया है बाते चाहे नहीं बनायीं, लेकिन जीवन-ह्रदय बसाया है कोई चाहे कुछ भी कह दे,सुन लुंगी-दुहरा भी दूं लेकिन जिसको दोस्त कहा था, उसको कैसे ठुकरा दूं? शायद मैंने गलत सुना था , या फिर तुमने झूठ कहा? गरिमा, मर्यादा रिश्तो की, रह गए नाहक शब्द भला? गर वो सब था दिखलावा, तो फिर आखिर सच क्या है? कोई मुझको बतलाये फिर इस रिश्तो का अर्थ क्या है? बेमतलब सब कुछ अर्थहीन , बातो बातो पे अग्निपरीक्छा कब तुम कैसी राह धरोगे, ये सब बस तुम्हारी इच्छा? चोट लगी जब सहलाया पुचकारा थोडा फुसलाया और फिर अपनी राह पकड़ ली, ऐसी कैसी रिश्तेदारी? है दम और बिस्वास जरा भी तो फिर दिखला सच्चाई करो सामना, यही वक़्त है, लो अपनी अपनी जिम्मेदारी
जटिल बड़े जटिल सवाल कई जवाब लेकिन नहीं कोई सही जवाब उपयुक्त? लगते से कुछ मुझे लेकिन, वही बे बुनियाद जब उन्हें परखो फिर एक बार भ्रमित, उलझन में खोया सा मनुष्य, परखते परखते एक के बाद,एक और जवाब किसी बिरले की होती है किस्मत भली की लगता है अंक सही पहली या दूसरी बार और समेट मोहरे, मनाता है जीवन का त्यौहार हम तो उन बचे खुचे लोगो की भीड़ में जिन्हे बस उम्र भर जवाब ढूँढने हैं.
है वक़्त कम जज़्बात बिखरे हुए हैं हो रही है घडी एहसास बस में नहीं है देर किस बात की? और लज्दी भी कैसी? सिमटे से दायरों में फैली-फैली जिंदगी.
परछाई मेरी चलती तो हो मेरे साथ साथ क्यों नहीं बोलती कुछ क्यों रहती हो चुप चाप तुमसे करीब और कौन मुझसे तुमसे दूर रहे कोई कैसे गुम हो जाती हो लेकिन, अँधेरा घिरते ही छोडती हो मुझको अकेली , जान के भी की डर लगता है मुझको, हर अंधकार से ख्याल आते है, बेकार न जाने कहाँ से रौशनी की एक किरण से, उठ कड़ी होती हूँ मेरी परछाई, मेरी सहेली, को जो पाती हूँ कद तुम अपना भले बदलती रहेती हो पर सच तो ये है, साथ सदा रहेती हो
आज सुबह उठकर किरणों से रोशन, देखा भीगी घास में उछलते भागते, और चुचाप बैठकर निहारतेएक खरगोश को, लगाते छलांगे तो फिर पूछा मैंने, क्यों क्या तुम भी जागे हो कल रात नहीं आई नींद - क्यों की थी मन में सोच? क्या लाएगी कल की सुबह या भी था डर की होगी या न होगी सुनहरी तकदीर और लाएगी भोर करवट बदलने में भी ये थी झिझक की कही डोलेगा इन्द्र का सिन्हासन और आज ही की रात हो जायेगा सब भष्म किसी तरह से काटी रात दर-दर कर ली हर एक सांस धुप की हर किरण से जगी उम्मीद और आये हो देखने, बाहर भविष्य क्यों किया व्यर्थ तुने ए दोस्त वो स्वपन जो आनेठे कल रात रह गए अधूरे कई ख्वाब जाओ जाओ जी भर के जी लो ये पल क्युकी बस यही तो जो, फिर लौट के नहीं आता