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कुनमुनाता सा उठा है दिल में पुराना कोई जोश हाय अब अर्सो के बाद आया है फिर से जैसे होश सर्दियों की भोर ये और रूह तक की कपकपी आरज़ू की आंच में अब लम्हात की रोटी सिंकी बस सुक़ून थोड़ा सुक़ून तुझको मिले मुझको मिले खुद से फिर जी भर मिले भूल कर शिक़वे गिले 
हाईवे से एयरपोर्ट का एग्जिट लेते ही, धक् से हो जाता है व्योम. व्योम का भी कुछ छूटा जा रहा है आज. चाभी, वॉलेट, पासपोर्ट, लगेज, सब तो है ? है। सब है. टाइम पे पहुँच भी जायेगा, सब कुछ जैसे प्लांड था वैसे ही है. बस इस छूटे जाने के एहसास को छोड़कर. क्या कह रही थी वो? मैं कहाँ सुन पा रहा था जब वो कह रही थी, मैं तो बस देख रहा था उन होठों को खुलते बंद होते। मैं तो बस देख रहा था उन पलकों को उठते गिरते और मैं सुनता भी कैसे ? जब उसकी उंगलियां मेरे हाथो पे चहलकदमी किया करती है, मुझे कुछ सूझता कहाँ है और बस जी में आता है इनकी चहलकदमी को तभी का तभी अपनी मुठ्ठियों में कैद कर लूँ , इन होठों को वही रोककर अपनी पलकों से उसकी पलकें बंद कर के सुनु सिर्फ आती जाती साँसे। सुनना तो दूर, क्या बोलता हूँ वो भी याद नहीं रहता. सच में? एक ही कहानी बार बार कहता हूँ क्या उसको? वो तो ऐसा ही बोल रही थी लेकिन मुझे कहाँ याद. हर बार नयी सी लगती तो है मुझे, जब भी कुछ कहता हूँ. वो सुन भी रही होती है, उसकी आँखों का इंतज़ार शायद मुझे कंफ्यूज कर देता है। .. की ये कहा भी था या नहीं? क्या फर्क पड़ता है, मुझे नहीं लगता की वो...

स्कार्फ़

खास है दिसम्बर नहीं? एक ऐसा समय जब बीता साल लगभग छूट रहा होता है पर आने वाला साल नयी उम्मीदों के परवान चढ़ रहा होता है. माहौल खुशनुमा न सा होता है, ख़ास कर न्यू यॉर्क में. छुट्टियों के दिन , हर तरफ सजावट, लोगो की भीड़ भाड़, दोस्त परिवार सब के साथ भरा भरा सा संसार। लोग यु ही एक दूसरे को देख कर मुस्कराते है, समय जैसे थोड़ा मध्धम सी रफ़्तार पकड़ लेता है. सड़को पर चलते, कानो में सेंटा के बेल्स और साँसों में ताज़ी क्रिसमस ट्री की गंध भरना लाज़मी सा हो जाता है. सर्दियों के दिन होते हैं और गर्माहट के लिए धरा कभी कॉफ़ी का कप तो कभी अपने जीन्स की पॉकेट में उंगलियां सेंकने को ढूंढती रहती हैं.  घर से निकलते ही आज चेहरे पर बारिश की बुँदे दस्तक देती है. बारिश? नज़रे दौड़ाती है तो दूर दूर तक धुंध सा दीखता है, और मोर सा उसका मन अपने पंख पसारने को उठ बैठता है. कार स्टार्ट करके निकलती है, विंडो पर वाइपर अपने आप बूंदो से लड़ना शुरू कर देते है और बजने लगता है रेडियो पर... ...नैनो ने बाँधी कैसी डोर रे, मुंसिफ ही मेरा.. मेरा चोर रे. ट्रैफिक भी जैसे रूककर बारिश के मजे लेने लगती है, इन सड़को...
सफ़ेद चादरों की सिलवटों में बस इंतज़ार ही है, की कुछ अंगड़ाई कभी टूटती. कुछ नयी सी सिलवटें , कुछ नयी सी ओस में चमकती इन धागों की भी लड़ियां। औंधी पड़ी मीरा , बस यही सोचा करती है आजकल. सर्दियों की शामें और भी तनहा, और भी वीरान हो रखी हैं. न तितलियाँ हैं , न फूल और नहीं लम्बे वाले दिन. निगोड़ी बेइन्तेहाँ लम्बी रातें ज़रूर हो गयी हैं, इसमें इंसान सो न पाए तो ? शामत ही है समझो. और एक टेक्स्ट मेमैसेज पलकों पे वैसे ही उभरता है, जैसे परसों फ़ोन पर आया था, एक लम्बी मीठी और हलकी सी टीस के साथ. “आ जाओ “ आगे पीछे कई सारी और भी बातें है , लेकिन इन दो लब्ज़ो में जैसे कायनात की सारी बेचैनी और सारे अरमान भरे पड़े हैं. मीरा के, बस अकेले उसके। और कही कोई नहीं. वो जानती है, कहने भर की बात है बस. सब कहते है , ये लड़की ख़यालो में जीती है बस. पागल है, पत्थर की मूरत से दिल लगा बैठी है. दिल लगाना तक तो ठीक था , अब तो ज़िन्दगी दांव पर लगा बैठी है. न इसे पहर की खबर होती  है न कुछ होशो हवास। उठती है मीरा , क्युकी चादर पर अभी भी उतनी ही सिलवटें है। ..वही की वही, जस की तस. जैसे परसो थी।  न व...

प्रोपोज़

आज थोड़ा कुहासा सा है बाग़ में, फ़रवरी का महीना जो है. लेकिन इस ठंढ वाली भोर में हलकी सी ख़ुमारी भी घुली महसूस होती है. सूरज की किरणे बड़ी मुश्किल से इस कुहासे वाली भोर को धूमिल से जरा नारंगी और गुलाबी रंगने की कोशिश में हैं और ऊंघता हुआ गुलाब अब जाग रहा है. ये वाला गुलाब जरा नीचे वाली में डाल पे खिला था , इसीलिए उसतक तो सूरज की किरणे वैसे भी नहीं पहुँच पाती. शयद इसीलिए ये थोड़ा रंग के मामले में भी मार खा गया और बाकी साथियो के तुलना में बढ़ भी न पाया. और तो और ऐसी जगह में फंसा पड़ा है की ज्यादा भवरे और तितलियाँ भी यहाँ नहीं फटकती। उठ के करना ही क्या है, थोड़ी देर और सो लेता हूँ. सोचते हुए गुलाब फिर अपनी पंखुडिया थोड़े ढीली छोड़ ऊँघने लग गया. पर बाग़ में होती चहलकदमी ने आखिर उसे फिर से जगा डाला. आज कुछ ख़ास है क्या? उचक कर देखा तो भौचक्का रह गया. कल तक तो सारी की सारी क्यारियां और उनमें पनपे हर पौधे की डाल गुलाबों से लदी पड़ी थी, कहाँ गयी सब की सब. बस मेरे जैसे कुछ यदा कदा फंसे वाले ही बच गए हैं और झुरमुटों से एक दूसरे को ताक रहे हैं आज? क्या हो गया बाग़ में? हज़ारो तो थे कल तक, हर रंग में इठला...
प्रिय चाह जो है तुमको मैं हाथो से अपने वो उबटन लगाऊं बदन पे तुम्हारे हल्दी में जिसके तन ये मन, मेरा रंगा है और जब मैं रंगूंगी उंगली से अपने प्रेम विलीन हो बंद करके पलके खोलकर आंखे, तुम देखोगे और कहोगे नहीं ये तो वो रंग नहीं है क्युकी उबटन , हे प्रिय मेरे प्रेम का, मेरे शरीर पर दमकता है ऐसा कुंदन सोने सा जलता जो है दिवस रात्रि, प्रेम प्रेम में भीग भीग , जलता है तुम जले हो क्या कभी, इतना ? तो फिर? कैसे? जाओ नहीं लगाती मैं और 
हाय कौन सा रंग भर गए मोहन हमारे होठ में आईना चुप हो गया है सखियाँ गयी सब रूठ के धो धो के, पोंछ पोंछ कर थक के अब मैं हारी रे अब तो सारे जग ने जानी मैं श्याम, तोरी बावरी रे किस जनम का बैर है जो इतना सताते हो हमें बांसुरी की धुन पे लाखों रतियाँ जगाते हो हमें मारे जलन उस बांसुरी के अब मरी जाती हूँ रे होंठ पर तुझको धरे तेरी हुए जाती हूँ रे 
एक फुहार सी बरसती है कभी कभी तेरी प्रीत और मैं भींग जाती हूँ मेरे रोम रोम तक होकर मगन होकर तृप्त मेरे श्याम खुद से ही लिपटकर रीझ जाती हूँ मेरे अंतर्मन तक करके तेरा ध्यान और अभिमान होकर श्याम  एकाकार अपने प्रेम से अपने ही मन को सींच जाती हूँ 

Start over

Start over Start over as the shiva destroys After the dance of rage Burns to ashes, everything good and bad Behold and know, everything comes to an age The snakes hiss, the snakes may bite The fear multiplies, crippling psyche The clouds dark grey Surround you in rolling thunder For a long long time We choose to bury, under And then the moment arrives When you choose to break away Burn down, rip apart For whatever, it takes One must lose control To gain it back The first day falls Only after it is pitch dark Life is a gift, bestowed upon us The beautiful journey, worth every minute With love, gratitude and peace I accept my life, as it is , as it is
सुबह हो गयी क्या? उनींदी सी , राधा पूछती है. पर कोई जवाब नहीं आता. कुहनियां उठाकर देखती है, अयान गहरी नींद में हैं. राधा आंखे बंद कर लेती है, कुछ घड़ी के लिए. कैसा होगा जमुना में उतरता इस उगते सूरज का प्रतिबिम्ब? देखा तो है कई बार. ऐसे ही उनीदी आँखों से, उसकी आँखों में. कई बार. ऐसे जैसे कह रहा हो, राई जागो गो .. जाऊं? कहाँ जा रही हो ? राधा सुनती है, आंचल को अपने सर पर थोड़ा और खींच कर पलटती है. पानी...लाना होगा न. अभी चली जाऊं? या। अयान जा चुका है. राधा ठिठक कर सोचती है थोड़े देर. फिर न जाने किस ग्लानि में धम्म से वही बैठ जाती है. क्या करूँ ? कितने दिन हो गए , उस रस्ते की मिट्टी इन पैरों से नहीं लगी. सोचते सोचते उंगलियां अपने आप उसके आलता लगे पैरों पे रेंगने लगती है. कैसे बर्फ़ की सिल्लियां कहा करता था इन उंगलियों को. आंखे भर आती है, आंचल माथे से और नीचे सरक आता है। हाथ ख़ुद ब ख़ुद खाली मटकी की ओर. जैसे किसी धुन में हो, पैर खुद रास्तो को जानते है. ये बृन्दावन की सड़क नहीं पर फर्क होता है क्या? सब एक ही होते हैं न? बस चलने वाले बदल जाते हैं. कब और कैसे राधा घाट तक जात...