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अधूरी कहानी

धरा - सवाल पर सवाल? आकाश  - पर जवाब एक नहीं  धरा - क्या जवाब दूँ और कैसे? आकाश - तुम तो कहानियां लिखती हो, बना लो कुछ भी. धरा - कहानियां तो तुम भी कम नहीं बनाते, हर रोज़ कुछ न कुछ नए किरदार  आकाश - अच्छा?  धरा - हाँ, और क्या। ऊपर से सब की सब अधूरी।  आकाश - तो तुम ही पूरी कर लो. धरा - करुँगी, जब वक़्त आएगा।  कहकर, धरा ने चुपचाप अपने रंगो की बास्केट उठायी, साथ में कैनवास , इसल और ऊपर ताक पे रख छोड़े ख्वाब भी.  और, निकल पड़ी ढूंढने कोई ऐसी जगह जहाँ से कुछ ऐसा दिख पाए की वो ख्वाब अधूरे ख्वाब जिंदगी में न सही पर कैनवास पर तो पुरे होते दिख सके.  न जाने कितने कैनवास , कितनी पहाड़िया और कितने ही सूरज उग  कर ढल चुके हैं पर धरा की उम्मीदों की उम्र अभी बाकी है.  आकाश उन ख्वाबो की तकदीर नहीं हो सकता है, जानती है की बस वो यु ही कुछ कहने और देखने भर को आया जाया करता है. कई बार बादल भी भेज दिया करता है, जिनमे वो जी भर भीग लेती है.  आज आस्मान साफ़ है, और कही कोई नहीं। नितांत एकाकीपन ही तो अंतरंग मित्र बच गया है अब, सोचकर ठहाके लगा पड़ती है धरा और गूँज जात...
  बलात्कार कहाँ?   हां, लापरवाही हो सकती है  अब अकेली गयी ही क्यों?  घर में कोई था नहीं क्या?  कोई मर्द?  जैसे बाप या भाई  हाँ, अब पड़ोस के छोरे संग जाएगी  तो छिछोरी तो कहलाएगी न  जवान लड़की को मना करना था न हाँ, अब बारह तेरह की तो थी न  वो सब उम्र की जाने दो  लड़की तो थी न ?  पता नहीं था क्या किसी को?  अब घर की औरतो का काम नहीं है क्या  की सिखाये बताये  क्या पहनो , कैसे बैठो  क्या बोलो , कितना बोलो  अब नहीं किया तो भुगतो  क्या शोर लगा रखा है  टीवी बंद करो अब  ये सब शरीफ घर की  लड़कियां नहीं देखती  कहकर हम भले लोगो ने  खिड़की दरवाजे बंद किये  कमरे में देर रात कराहने  की आवाजे आयी थी जिनको भरसक अनसुना भी किये  अब, ये तो घर घर की कहानी है  आज किसी तरह कट जाए  बाकी कल सुबह देखेंगे 
 हरेक लम्हा है बुनियाद  जो इमारत पक्की बनानी हो  या ये ईंटे फेक कर मारो  और सोचो, मेरा घर कहाँ गया?
कैसे बनके बदली  बरस जाना चाहती हूँ  तेरी आशिकी पी कर  तरस जाना चाहती हूँ  क्यों तू चुभता है अभी तक  सीने में खंजर सा  दर्दे इश्क़ की चिता में  सुलग जाना चाहती हूँ
 मेरी उंगलियों को अभी भी तेरा अक्स याद है  थी कभी जिससे मुहब्बत वो शख़्स याद है  गुजरती है, गुजरेगी। तमाम उम्र बस यु ही  तू न सही, तनहा राह की हमसफ़र याद है
प्रेम बिकता है तो  विरह भी तो बिकता है यहाँ  नहीं बिकती है तो  बस जीने की आरजुएं यहाँ  वो मिल गए थे अच्छा  बिछड़े तो और भी बेहतर  ख्याब बिछड़ो के मिलाने के जनाब! बेहाल और बदतर 
 अच्छा सा लगता है  और जी करता है  बस सुना करूँ  न बोलूं न सोचूँ  न हाँ हो, न ना हो  झूलते रहे लम्हे  यही कही और  बाते तुम्हारी ख़त्म न हो  मुलाकातें ख़त्म न हो  लेकिन  आज, बस इतना ही. 

बस रौशनी

कौन कहता है  झरोखे से उम्मीदे आएंगी  कौन कहता है  किस्मतें, आके जगायेंगी  कौन कहता है  की, बनेगी तकदीर अपने आप  कौन कहता है  जो जानो, खबर करना जनाब  हम तो लपेटे बदन से ख्वाब के चीथड़े  शर्मशार से, खुद को बचाये बैठे हैं  ये लम्बी रात जब तलक न कटेगी  सुबह की देहरि पे, जां लुटाये बैठे है  लगाकर टकटकी, करते है इंतज़ार की  एक सुबह आये  उसके आने से पहले, न कहीं आँख  ये छलक जाए  बस रौशनी देखनी है  मुझको जी भर के खुदा  अब तो सबकुछ   गवाए बैठे हैं 
दुर्गा  कब तलक बस घोषणा  होगी यहाँ संग्राम की  कब तलक चिंता करोगी  बैठी यहाँ परिणाम की  कब तलक बजती रहेंगी  दुदुंभिया, इस ओर से , उस ओर से  कब तलक प्रतिशोध की  ज्वालायें धधके, जोर से  कब तलक करती रहोगी  प्रार्थना और अर्चना  कब तलक उम्मीद से  टल जाएगी यह वेदना  अब बस हुआ, अब नहीं है  कोई रास्ता वापसी  अब नहीं, अब नहीं कोई  ये मामला आपसी  अब नहीं है डूबती  नैया कोई मझधार में  देख ले, जीवन प्रतीक्षा  कर रहा , उस पार में  नाव खेनी तो पड़ेगी  हैं काटना भी सर्प सर  एक बार तो अब, आज  अपने भी हठ पर गर्व कर  विश्वाश रख कोई नहीं जो लड़ सके तेरे कर्त्वय से  है ये पृथ्वी कांपती  जो तू आ जाये, अपने सत्य पे  कैसी माया और कैसा मोह  अब किस बात का  साँच को अब आंच नहीं  अब अंत है इस रात का  है तुम्हारे हाथ में ही  तेरी किस्मत जान ले  प्रेम तुमने बहुत दिया  जा, महिषासुर की प्राण ले  उस दैत्य के अब प्राण ले 

ऐसे कैसे न बोलोगे

"मैं ही क्यों?" कुछ नहीं बोलती मीरा. "बोल न? वरना चला जाउंगा मैं." कबीर ढीठ होकर जरा सा धमकी के लहज़े में कहता है. कुछ तो असर करेगा इसपे। फिर भी , कुछ नहीं कहती वो एकबार फिर. "सुन भी रही हो? जाओ नहीं बोलता मैं भी कभी तुमसे। " अब रुठे से अंदाज में मुंह घूमा लेता है. "ऐसे कैसे न बोलोगे?"  कबीर की ठोढ़ी पकड़ कर अपने चेहरे के सामने ले आती है और अब वो देखता रह जाता है. ऐसे, जैसे पहली बार देखा था. "क्या हुआ? बोलती बंद हो गयी? बोलो क्या पूछ रहे थे? यही न की , तुम ही क्यों कोई और क्यों नहीं ?. मुझसे नहीं पूछ रहे ये सवाल, मन में झांको और जानलो , ये सवाल तुम खुद से पूछ रहे हो. खुद जानना चाहते हो की तुम ही क्यों? मैं तो जानती ही हूँ. इसीलिए तो यही हूँ डटी और टिकी। न कभी कम, न कभी ज्यादा। न कभी कुछ चाहूंगी , न कभी कुछ मांगूगी। जवाब भी नहीं, कोई सवाल भी नहीं। चलेगा? निभेगा तुमसे ? लेकिन बस रहने दो, रह जाने दो न मुझे ठीक मेरे जैसे" हाथ जोड़े, नैने में जल भरे. ना, ऐसे नहीं देख सकता तुझे मैं, कबीर मन ही मन विचलित होता सोचता है. तू तो...