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इंतज़ार

 कब से  कब तक  और कितना  इंतज़ार  और क्या मिलने से  इंतज़ार ख़तम हो जाता है?  और क्या इंतज़ार न करने से  इंतज़ार ख़तम हो जाता है?  तुम हसते रहे, सबके साथ  वक़्त यु गुजारा किये  की बस, जो है यही है  और कही कुछ भी नहीं है  वही पर हमने, लिखा, कहा  एक एक दिन को कागज पर नापा  उसको पहचान दी, नाम दिया  तो क्या हुआ? तुम्हे जिरह तक करनी पड़ी  बताना पड़ा मुझे  मैं बस अभी नहीं हूँ, लेकिन हूँ  मैंने सौ दफा तुम्हे याद दिलाया  बेकार की बाते तुम्हे बताती रही  कभी शिकायती अंदाज में  कभी आँखों में आंसू भरकर  तो कभो ये कहकर की  चलो, अब जान में जान आयी  सच तो है की  मेरा इंतज़ार तुम्हारे इंतज़ार से  ज्यादा और बड़ा नहीं हो गया जैसे  हवा थी  सांस है  कभी तेज़ कभी कम  कभी सन्नाटे में गूंजती हुयी कभी शोर में दबती हुई  वैसे ही  इंतज़ार था  और शायद थोड़ा सा रह जायेगा  मिलने के बाद की  करेगा इंतज़ार, क्युकी वो  कम्बख्त  कभी ख़तम होता है क्या?...
 गड़ती चुभती सी है वो रात  जिसकी सुबह में तुम न होंगे  सांसे खर्च हो रही है पर  कमबख़्त फासले कम न होंगे
 शायद ये सच ही है  पर सच तो ये भी है  की तुम सुनने लगे हो  तो हम कहने लगे है  खयालों में सही  साथ रहने लगे हैं  वक्त की बात है  आज है कल नहीं  खामोशी वैसे भी  कोई हल तो नहीं?  कह लेने दो ना  मुझे रह लेने दो  जब मैं बरशा करू  ख़ुद को बह लेने दो  जैसे चाहोगे तुम  वैसी हो जाऊँगी  हँसी तुम्हारी खो गई  तो मैं भी खो जाऊँगी  बहुत शुकून है की  अभी साथ में तुम हो  बहुत शुकून है की  की हर बात ने तुम हो  की हर बात ने तुम हो

Three different worlds

"किसके इंतज़ार में बैठी हो" चौंक गयी, मीरा। उसकी तंद्रा भी टूटी। न जाने कब से बैठी है पार्क के इस बेंच पर , और उसकी आधी सिगरेट  घास में गिर कर कब की ठंढी हो गयी है. क्षितिज उसके पास ही बैठ गया. कोई कुछ नहीं कहता एक दूसरे को अगले कुछ पलों के लिए. फिर अपने आप पर जैसे काबू कर लेती है मीरा और तपक कर अपने अंदाज में बोल पड़ती है. "तुम्हारा तो बिलकुल भी नहीं" दोनों ठहाके लगाकर हंस पड़ते हैं. क्षितिज भी जानता है , बस इतना सा ही रिश्ता है उसका मीरा से. मीरा न जाने कैसे एक अनजान सी दीवार में घेरे रखती है हमेशा आपने आपको और उसको फांदने की कोशिश भी पूर्णतया व्यर्थ है ये अब तक में क्षितिज जान गया है. मीरा ऑफिस की सबसे काबिल अफसरों में से एक है , क्षितिज जब आया था कंपनी में तो मीरा को शायद एक साल हो गए थे लेकिन एक ही साल में मीरा ने अपनी काफी धाक बना ली थी. क्षितिज अलग डिपार्टमेंट में है और अब तो काम के सिलसिले में कुछ भी वास्ता नहीं पड़ता मीरा से. शुरू में ही एक प्रोजेक्ट को लेकर उसने कुछ दिन मीरा के टीम के लोगो से बात की थी और भांप गया था उसके मन को. मीरा के पर्स...
एक दराज में पड़ा पुराना खत मैं हूँ देख ज़रा आईने में, आँखों में मैं हूँ  कभी छलकते हैं जो, नैनो से दिल के टुकड़े  देख सहेज उनको जो, शुकुन  का सच मैं हूँ  दूर सही मंजिल पर , रस्ते तो हैं  नमी निगाहो में फिर भी, हस्ते तो हैं  उजड़ा उजड़ा सा क्यों न हो चमन यहाँ  एक दूजे के दिलो में हम, बसते तो हैं  मेरे लबो पे लब तुम्हारे हो, तो क्या हो  तेरी मुहब्बत मेरी रगो में, बहे तो क्या हो  एक लब्ज कैद है अर्सो से , इज़हार का   कही परिंदा दिल से उड़ जाए, तो क्या हो  कह दिया करती हैं आँखे हाले  दिल  बस कोई पढ़ने को होना चाहिए  पुरे हो जाते हैं अरमा ख्वाब में  हर रात जी भर, इश्क, सोना चाहिए  हाँ हंसी हूँ मैं तो गुरुर क्यों न हो  है नशा ये इश्क का शुरुर क्यों न हो  जो नश्तर ही निगाहें और उनका दिल निशाने पर  खुदा खैर करे, फिर एक कसूर क्यों न हो  मुहब्बत है दीवानो सी तो कह देना था कभी  हाय ये इंतज़ार की उम्र  तेरी ख़ामोशी से लम्बी 
  जब तलक रूह है जिन्दा और साँसे बदन में  यु ही तनहा तड़पने की ज़रुरत क्या है  आजाऊंगी सजाके मैं मेहँदी, ओढ़े घूंघट  बस तुम कह दो, मिलने की मुहूरत क्या है  न चरागों से मांग कर रौशनी  एक अपना दिया जलाया होता  न उम्मीद उनसे प्यार की करते  खुद को सीने से लगाया होता  न बिखरते यु टूटकर के हम  न अँधेरे यूँ किस्मतो में होते  शुकूं से उम्र अपनी भी कटती  काश, दिल ही न लगाया होता 

Home

 When two humans can’t have enough of each other’s body, mind, and spirit… When two humans can’t stop nourishing each other’s body, mind, and spirit… When two humans begin to feel each other’s pain — in body, mind, and spirit — they know. This is it. This is home. We are home.

हाँ, तुम्ही को

 तुम  हाँ, तुम्ही को  और किसको?  और क्यों कहूँ  बस तुम जो समेट लो तो मैं हर बार बिखरूँ  चुन लो तुम मेरे आँसू  गिर जाने से पहले  तुम्हारे अनकहे दर्द  हम हथेली में भरले  और बहा आए गंगा में  की बस इतना ही था  किसी ना दिन हमको  भी तो मिलना भी था  और बननी थी ये कहानी  जिसमे आदि है ना अंत  बस तुम हो बस मैं हूँ मन में ख्वाहिशें अनंत  सब सौंप दूँ   जो समेट लो तुम  हाँ, तुम्ही को  और किसको?
 रिश्ता कुछ भी हो  उसका नाम हो या नहीं  वैसे भी वो सब  ज़माने के कायदे भर हैं  खोखले , बेवजह , बेबुनियाद  आज दिए और कल ले भी लिए. लेकिन वादा , अपना है  और मजबूत इरादा भी  की, खुशिया  आशाएं , सपने और भरोसे  बने रहे , न हो टस से मस  क्युकी, ये मेरे अपने है  आजाद बनावटी रिवाज़ो से  सगे , आत्मा की आवाजों से  सूरज की रौशनी सी नियमित  प्रकृति की नियमों में सीमित  प्रेम, का क्या है वो तो मिट्टी के माधो से भी होता है   पहले हम ढंग से करना तो सीख ले? एक बार कभी , मीरा बनकर तो देख ले  जरुरत, चाहती है - मांगती है  प्रेम, तो बस उमड़ पड़ता है  उझल देना चाहता है  और बिखर जाने में ही उसका निमित्त है  और कहीं कोई समेट ले  तो बस

तुम रोक लो

 यु ही बीत जाया करेंगी शामें  और शायद, जिंदगी की शाम भी  उस शाम भी  तुम कहना ,हम सुनेंगे  लेकिन सुन लो  सुबह कैसी भी हो  वो बस मेरी होगी जब मेरे इशारे का इंतज़ार  करता सूरज , वक़्त को रोके  देखा करेगा , तबतक जबतक  मैं न कहूँ , ये रात इतनी ही थी  हमारी बात , इतनी ही थी  और आते ही धूप परदो से  मैं चुप हो जाउंगी , की तुम रोक लो  मुझको कहना न पड़े, तुम रोक लो  और मैं फिर चुपचाप रुकी रहूँ  किसी दरवाजे की ओट में  और तुम बाते करते रहो  चाहे जितनी , शाम तक  उजालो की , ठहाकों को  समंदर की, किनारों की  और फिर ढलते ही शाम के  सौंप दो सारे अँधेरे की मैं   रोशन करू उनको कभी फूलों के पायल से   कभी नीले से काजल से  कभी एक लौ हो रोशन सी  कभी कोई दाग होठो की  कभी फिसलती सी उंगलिया  कभी उलझती सी बालिया  कभी सांसे बहकती हो  कभी धड़कन ठहरती हो  रोशन रहे बस रात  की मैं सुबह को  फिर चुप हो सकूं  इठलाते हुए  तुम से कहूँ  फिर र...

Love is

 Love is The way I see you Love is  My desperate wait  Love is  How we fall apart every time Like first time, and yet be  Most put together, every time  Love is All of that, and so much more  That we are yet to discover.  That’s love. That’s you. 

winding path

 It feels too soon, Yet never enough. You feel the closest, Yet drift so far. Dimensions of life— We move, we breathe We touch, we part In echoes of time and space. These moments overlap, In body, in mind, In everything unseen, Yet deeply felt. Whatever this is, I am grateful. Grateful for you, For this, for all For the winding path That led me here.

इश्क़ बताएं

 लव शव छोड़ो  चलो तुम्हें इश्क़ बताएं  कब कैसे और कितनी  काटनी हैं सजायें   दूर रहकर भी दूर  जब रह नहीं पायें  पास आकर के जाना  जब सह नहीं पायें  हर बात बतानी हो  और पूछना भी हो  रोज मनाना भी हो  पर रूठना भी हो  सोचा करे जब तुमको  तो तुम्हारी फिक्र हो  चेहरे पे रंग आये  जब जब ज़िक्र जो  तुम्हारे होने से ही कायम हूँ   ये तो बस इश्क़ की बात है  वरना हमसे ये सब करा ले  इतनी क्या लव की औकात है ?  😆😆

आप आया करे

 आप वक़्त निकालें  और आया करे  हमसे मिलने तब  जब  सुबह हुयी भी न हो  रात बची भी न हो  लेके हौसले बुलंद  आंखे, खुली कुछ बंद  सांस ठहरी सी, मंद  आप आया करे  और, रुक जाया करे  हम परदो को गिराकर  शामें ज़ाया करे   उँगलियाँ फंसी से हो  लबों पर हंसी सी हो  ठहरी , ख़ुशी सी हो  कब?  तब.  जब जब , हम बुलाया करे  आप आया करे.  आप आया करे.

গল্প

 গল্প  এখন অনেক বাকি আছে  তুমি থেকো, বসে থাকলেই হবে  চোখে চোখ  বুকে বুক  ঠোঁটে ঠোঠ  রাখলেই হবে  শুনছো  এখন অনেক বাকি আছে  তুমি থেকো, বসে থাকলেই হবে  গল্প 

गुलाबी एक धागा

 जब जब दूर , दूर से  तुम महसूस होते हो जब जब खींचता है मन  और लगता है, सिर्फ मेरा जब जब रोकना फुसलाना  बहलाना पड़ जाता है मन को  जब जब पुरानी टीस बहाने  से उभर आती है , ज़ोर से  तब तब तब तब  कोई कड़वाहट नहीं बल्कि  सनी सी शहद में कोई हंसी  हम ढूंढ लाते है  और गुलाबी एक धागा  उंगलियों में बाँध लेते है  कसकर , ठीक वैसे  जैसे तुमने , बाँध रखा था  मुझे एकबार  तब तब  तब तब  टूटकर एकबार फिर से  मन बिखरने का , मुझको  रोक लेता है और मैं वहीँ  कही बंधी पड़ी रह जाती हूँ  जब जब , तब तब

बारिश

 बारिश  आप कहेंगे तो होगी  वरना थमी रहेगी  जबतक यु ही हमारे  दिलों में ठनी रहेगी  फिर गिनेंगे आपकी वो धड़कने  रख लेंगे मानके आपका इज़हार  मेरे कानों को  छूयेंगी आपकी  साँसे और नीली चादरें करेंगी ख़त्म इंतज़ार   कहो न गर्मियों से अब  पिघल के टूट जाएँ बस  कहो न बाज़ुओं में अब  बिखर के छूट जाएँ बस  बारिशें भी जलाती हैं  अब जाकर पता लगा  लेकिन, बरिशो को भी ऐसे   कोई प्यासा रखता है भला ? वो दाग, मिट न जाएं सुनो  तुम अभी अब देर न करो  दबे पांव चले आओ  सुनो, कोई शोर न करो  पाओगे मुझे वही  जहाँ बारिशें जन्मती है  तुम्हारे होने से ही तो  तितलियाँ पनपती है  अपनी उंगलियों से  बारिशें आज़ाद कर दो न  तकल्लुफ ख़त्म ही कर दो  अब मुझे बर्वाद कर दो न

वट सावित्री

  वट सावित्री वैसे तो सावित्री और सत्यवान की कहानी सबको पता ही है , लेकिन किरण सोच रही थी की आजकल जब प्राण की रक्षा के लिए डॉक्टर हॉस्पिटल और साइंस है , क्यों करती है औरतें एक पेड़ के नीचे प्रार्थना.  ऊपर से अमेरिका में तो इतनी गर्मी भी नहीं पड़ती इन दिनों में, की पति को पंखा झूला के कुछ ठंढक देना कोई काम की चीज़ हो.  और उपवास में सज धज कर दस और औरतों के साथ , क्यों?  मेमोरी के पन्ने पलटे तो देखा, भी  मैं उनमे से एक थी तो जवाब तो उसके  पास भी होना चाहिए, तो उनमे से कुछ ऐसे कह डाले किरण ने  १. मैंने अपनी माँ को देखा था, तो बस उन संस्कारो को जीवित रखना था. आखिर एक दिन हम औरते अपनी माँ जैसी ही तो बन जाती है? नहीं?  २. हम औरते प्यार तो बहुत करती है लेकिन जब शब्दों की बात हो , कंजूसी कर जाती है. ऐसे में वटसावित्री और करवा चौथ जैसे मौके बहाने बन जाते है. एक दिन , सारा दिन मैं सिर्फ तुम्हारे लम्बी उम्र और स्वस्थ्य की कामना करुँगी, समय निकाल कर सवारूंगी श्रृंगार करुँगी , की तुम्हारी आँखों में वो प्रेम और कौतुहल देखूं जो शादी के मंडप पर देखा था।  ३. और ...

प्रेम है

  कभी रूह से और कभी देह से तुम  बुला लेना और बता देना की प्रेम है  कभी रूठकर और कभी बहल कर  सता लेना और हंसा देना की प्रेम है  कभी पास रहकर कभी दूर जा कर  दिखा देना और देख लेना  की प्रेम है  हूँ जिन्दा की मुर्दा कौन कहे देखकर  बस जान लेना की सांस है तो प्रेम है